बेज़ुबान अहसास

यूँ ही भटकते हुए पता नहीं
क्यों लौटा था बरसों बाद
पार्क के उस कोने की ओर
जहाँ खुशबू भरे माहौल में
रंगीन सपने बुने जाते थे कभी।

लकड़ी की बेंच अब वहाँ नहीं है
जिस पर बिखरा करता था
अल्हड़ उमंगों का ताना-बाना।

चहचहाते पंछी कब के उड़ गये
प्रेमगीत गाकर
नीम के मोटे तने पर,
नादान उम्मीदों ने गोदे थे नामों
के पहले अक्षर
सूखा ठूठ बना खडा है वह।

आज भी हवाओं के दामन पर
मंज़र दर मंज़र धुंधलाई हुई कहानियाँ
फव्वारों की इंद्रधनुषी फुहारों में
बिखर रही हैं कतरा कतरा।

खामोशी की भाषा पढ़ने वाली आँखे
अब कहाँ उस अहसास के साथ
जिसके पास केवल बेज़ुबानी बची है।

(रफत आलम)

About these ads

2s टिप्पणियाँ to “बेज़ुबान अहसास”

  1. bas saanson ki aawaaz hi goonjti hai in bezebaan ahsaason ko yaad kar *sigh*
    aapki kavita har roz mere inbox ko khushgavaar banaati hai – chaahe main comment karoon ya nahin.
    Likhte rahiye aur kitaab zaroor chaapiye.

  2. मोहतरमा वर्षा जी शब्द नहीं मिल रहे आपके लिखे पर कमेन्ट के लिए . आपने टूटे -फूटे अहसास को जो मान दिया उसके लिए तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ और एसी कमेंट्स से वास्तव में कुछ लिखने को होसला मिलता है .शुक्रिया

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 84 other followers

%d bloggers like this: