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अगस्त 26, 2011

अन्ना सोचो तो बताओ तो

मैं जनता हूँ
मुझमें और कसाई की भेड़ों में
बस इतना ही अंतर है,
भाषणों के बाजीगरों द्वारा
संवेदना की छुरियों से काटा जाता है मुझे।

मेरा पथप्रदर्शक ही असल पथभ्रष्ट हैं
उसका रास्ता सदा शहादतों को रौंधता हुआ
सत्ता सुख तक जाता है।

हर आंदोलन में ठगा जाता है
स्वप्निल दुनिया में जीने वाला मध्यम वर्ग
या फिर सर्वहारा शोषित
समाज की यही भीड़
ज़मीनी वास्तविकताओं से दूर
असम्भव को संभव बनाते वादाफरोशों की
सबसे बड़ी शिकार है।

कोई हो तो बताओ
आंदोलनो, क्रान्तियों या इन्कलाबों से
सत्ता परिवर्तन के सिवा क्या हुआ है?
जनता का कितना भला हुआ है?

समय के गुलाम उत्तेजित हालात
नियति के धारे में जाने कब बह जाते हैं
न भूख की तस्वीर बदलती है, न प्यास की सूरत।

अन्ना हो कि कोई दूसरा मसीहा
हालात में बदलाव के सूत्रधार
आंदोलनों के बेक़सूर औजार
ज़हर के प्यालों, सूलियों या गोलियों के शिकार
चौराहों पर पत्थर के बुत बना दिए जाते है।

कबूतरों का वास बन कर
बीटों में सड़ते रहते है बेचारे
बाकी कुछ भी नहीं बदलता
कैलेण्डर के पन्नों के सिवा।

(रफत आलम)

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