कितना ज़रूरी है सह-अस्तित्व पर चलना

भ्रष्टाचार
भौतिकवाद का लाडला परपोता है
जबकि पूंजीवाद इसका बेटा
और उपभोक्तावाद
भौतिकवाद का पोता है।

इतनी पीढ़ियों तक
जिस भौतिकवाद ने
अपने पांव जमा दिए हों
तो सोचो ज़रा
बाप, दादा, परदादा के होते
क्या तुम इस लाडले परपोते
भ्रष्टाचार के पांव उखाड़ सकते हो?

यह तुम कैसे भूल गए कि
तुम भी तो उस
राजा परीक्षित की संतान हो
जिसने कलियुग यानी
मशीनीयुग संपन्न भौतिकवाद को
अपने मुकुट पर जगह देकर
इसे सम्मानित, सुशोभित किया था।

इसके असर का जादू तो
तुम पर भी सिर चढ़कर बोलता है
एक चेतन पुरुष ने भी तो
सही कहा था कि
भौतिकवाद का चहेता पूँजीवाद
अपने नए नए रुप बदलकर
इन्सान को छलने के लिए शोषण के
नए नए तरीकों के साथ आता है।

उपभोक्तावाद हमारे युग का वही चेहरा है
जिसे भौतिकवाद की संतान पूंजीवाद ने
तुम्हे रिझाने के लिये
मैदान में उतारा है
और तुम उपभोक्तावाद से
ऐसे ही आकर्षित होते हो
और ऐसे ही नाचते हो
जैसे मदारी बन्दर को नचाता है
फिर भ्रष्टाचार से शिकायत कैसी और क्योँ?

यह तो बेचारा उसी उपभोक्तावाद का
बच्चा ही तो है
उपभोक्तावाद की न रूकने वाली प्रतिस्पर्धा में
तुम्हारा तो केवल
एक ही लक्ष्य है
प्रतिस्पर्धा यानि अपने पड़ोसी और
दूसरे लोगों से
तुम आगे रहना चाहते हो।

प्रतिस्पर्धा,
उपभोक्तावाद का ऐसा करिश्माई जादू है
जो हर व्यक्ति के
सर चढ़कर बोलता है
अगर तुम्हारे पडोसी के पास
मारूति ८०० है तो तुम
मारुति स्विफ्ट खरीदकर ही दम लोगे
उसके पास चार कमरे है तो तुम
आठ कमरे बनाकर ही छोड़ोगे
जब हर व्यक्ति प्रतिस्पर्धा के
चक्रब्यूह में फसा हुआ है तो
क्या भ्रष्टाचार पर किसी
जादुई छड़ी से अंकुश लगेगा
या फिर क़ानून बनाने से
कानून को लागू करने वाले और
उसपर अमल करने वाले
क्या आसमान से टपकेंगे
वे भी तो तुम्ही में से होंगे

इसलिए व्यक्ति सुनो!
जिस दृढ़ता के साथ
कलियुग यानि भोतिकवाद के मशीनीयुग ने
इस पृथ्वी पर अपना पांव जमाया है
क्या तुममे इतना धैर्य और दृढ़ता है
जो इस पांव को निष्प्रभाव कर सके, उखाड़ सके
अभी ऐसा नहीं लगता
फिर भी यदि कोई
ईमानदारी से
इस मज़बूत पांव उखाड़ने की
अपनी सोच में भी
नियत रखता है तो
वह व्यक्ति इसलिए ईमानदार है कि
उपभोक्तावाद उसे अभी
अन्धा और निष्क्रिय नहीं कर पाया
और उसकी चेतना जिंदा है।

यह जानते हुए कि
जीवन का अहसास
वस्तु से नहीं
चेतना से है
और प्रतिस्पर्धा–
एक व्यक्ति से
दूसरे व्यक्ति के बीच का
वह फासला है
जो उन्हें नज़दीक नहीं आने देता
और जिस दिन तुम
यह अहसास कर लोगे कि
यह फासला स्वाभाविक नहीं बल्कि कृत्रिम है
उस दिन तुम
प्रतिस्पर्धा की अन्धी दौड़ से
बाहर निकलकर
अपनी जीवनयात्रा के
सहयात्रियों का बारी बारी हाथ पकड़कर
इस जीवनयात्रा को
सुखमय बना दोगे
और इस तरह तुम
सह-अस्तित्व के पथ पर
चलते हुए
जीवन को जीवन की तरह
जीते हुए
इसे सार्थक कर दोगे!

(अश्विनी रमेश)

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4 टिप्पणियाँ to “कितना ज़रूरी है सह-अस्तित्व पर चलना”

  1. व्‍यक्तिगत इकाई का चरित्र ही राष्‍ट्रीय चरित्र में प्रतिबिंबित होता है.

  2. राहुल जी,
    सही कहा आपने,टिप्पणी हेतु धन्यवाद !इसीलिए तो हर व्यक्ति को आत्म-मंथन से चेतना का अहसास करना है !

  3. इस मजबूत पांव के विषय में आपकी गहरी सोच है, साधु साधु । मेरे प्रष्‍ठ सर्जना पर पढिये – फिर दिल्‍ली में बात चली है सारा सिस्‍टम बदलेगा। और एक ऐसे महान शिक्षक की कहानी जिसने सारा जीवन विद्यार्थियों के नाम लिख दिया ।

  4. Dr. Ram Kumar,
    My hindi font in other leptop is not working, so ,Iam writing in English. Thank a lot for your comment. As far as your theory of system change is concerned,I shall first study that and only then ,I can say anything, .Every individual can work best in his circle and thus can contribute a lot.

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