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अगस्त 20, 2011

जिहादी हूँ, दहशतगर्दी नहीं इंसानियत मेरा इस्लाम है

अजीब हैं दर्द का रिश्ता जो टूट कर भी नहीं टूटता कभी
ज़ख्म को सूखे बरस बीते फिर भी दिल को आराम नहीं

हम भी जिहादी हैं मगर इंसानियत की राह पर चलते हैं
ये जो तेरा इस्लाम है दहशतगर्द वो अपना इस्लाम नहीं

सच दिखाने की सजा किरच किरच पायी है दर्पणों ने
पत्थरों की इस बस्ती में शीशा दिल लोगों का काम नहीं

अपना ही लहू पीने वालों को क्या गरज मयखानो से
हमारी प्यास अलग है साकी जिसका मकसद जाम नहीं

ख़्वाबों में जीने की सजा नींद खोकर पाई है, क्या बताएं
जागती आँखें पूछती हैं पगले क्यों तुझको आराम नहीं

इस मयकदे में अपनी प्यास का मुदावा खुद करना होगा
यहाँ साकी को क्या परवाह किसे है किसको जाम नहीं

हराम खाने से बेहतर है पेट पर पत्थर बांधे गुज़र जाना
तलब वो ही है सच्ची जो हाथ फैलाने को बदनाम नहीं

आप बादलों के सायों से चाहे बहल लो वरना ऐ आलम
जिंदगी के रास्ते में कोई मंजिल नहीं कोई मुकाम नहीं

दहशतगर् – आतंकवादी, मुदावा – इलाज

(रफत आलम)

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