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अगस्त 14, 2011

तिरंगा : किस मुँह से फहराओगे, किस मुँह से देखोगे?

केसरिया रंग

हमारे तिरंगे का मुकुट
कट्टरता का प्रतीक बन गया है
पार्कों-स्कूल के मैदानों पर
तिरंगे का काम ही क्या?

भगवा झंडों के साये में
अस्त्र-शस्त्र चालन प्रक्षिक्षण शिविर
गवाह हैं जगाई जाती नफरतों के
जहाँ से केसर की खुशबु फैलनी चाहिये थी
बमों के विस्फोट हो रहे हैं
स्वर्ग को नरक बना दिया है नफरतों ने।

सफेद रंग

हमारे तिरंगे का ह्रदय
काले को सफ़ेद करने का जादू भर है आज
मोती तोंद वाले सफेदपोश
सिल्क खादी की जगमगाहट के पीछे
अपनी तमाम काली करतूतें
आसानी से छिपाए हुए हैं
सफेद वो सियाही है
जिसके लिखे स्विस खातों के नम्बर
किसी से नहीं पढ़े जाते
हाँ,

बीच का चक्कर

ज़रूर घूम रहा है
दलाली, कमीशन और घोटालों की
पहचान बन कर
दरसल आज़ादी के ये ही रसफल
हमसे चुनाव लड़वाते हैं
हिस्ट्रीशीटरों को नेता बनवाते हैं।

हरा रंग

हमारे तिरंगे की बुनियाद
गाँवों से लाता था हरियाली की मजबूती
खेतों में मासूमियत की खाद से
गहराती थी अपने पाक संस्कारों की जड़ें
उस विशाल वृक्ष तले अपनत्व की शीतल छाँव थी
शहरियत के कंक्रीट जंगल ने
मशीनी धुंआं फेंकते दानवों का
शोर उगा दिया है
पक्षियों की कलरव के स्थान पर
अपने-अपने सीमेंट के दडबों में बंद हुआ आदमी
भूल चला है सभी संवेदनाए
राजा हरीश चन्द्र का किस्सा अब किसे लुभाता है
आज नए  दौर के हीरो राजा–राडिया-कलमाड़ी-रेड्डी-येद्दयुरप्पा हैं
बेईमानी के हमाम में सभी नंगे
घोटालों–घूसखोरी की फसलें काट रहे हैं
रूपये-डालर-मार्क–येन-मार्क-पौंड का हिसाब
स्विस बैंको में है दफन।

एक बूढ़ा नैतिकता की बात कर रहा है
नूराकुश्ती में मग्न पक्ष भी, विपक्ष भी
सब होंठों तले हंस रहे हैं।

मेरे दोस्तों! स्वतत्रता दिवस बहुत मुबारक
क्या तुम्हे कल ज़रा भी ख्याल आएगा
किस मुँह से पी.एम.फहरायेंगे तिरंगा?
किस मुँह से तुम देखोगे तिरंगे को?

(रफत आलम)

अगस्त 14, 2011

एक पूरा दिन

उगते सूरज की सुबह
और डूबते सूरज की शाम के बीच
एक पूरा दिन है।

समस्यायों की फेहरिश्त के साथ
लड़ाई शुरु होती है
एक के अंत पर
दूसरी रोती है।

यह दोपहर से पहले का हाल है
उपलब्धियों के बीच
आदमी, कंगाल है।

मरीचिका की मार से
टूटता ज़िस्म लिये एक दौड़ जारी है
कुछ थोड़ा और
पाने की ललक भरी लाचारी है।

फटी-फटी आँखों पर
धूल अटी रुमाल है
सुबह की लाली में होश था
शाम की लाली निढ़ाल है।

और
दोनों के बीच
एक पूरा दिन है।

{कृष्ण बिहारी}

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