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अगस्त 12, 2011

श्वेत-श्याम के द्वंद

सफ़ेद और काले रँगों में
ज़न्मों ही से बैर है।

इन्द्रधनुष के घटक अवयवों में
सफ़ेद ही की उलट फेर है
कायनात में जो दिख रहा है,
देखा जा रहा श्वेत की बदौलत है।

फूल-बसंत-धूप-तितली
गुलाबी होंठ-कुंदन से बदन,
असीम शांति-पवित्रता-पाकीजगी
हसीन मंज़र–दिलकश नज़ारे
या फिर हों रोती रुतें
सूखे उड़ते पत्ते–पिंजरों के बेबस पंछी
अंतिम सच की यात्रा के लिए कफ़न
आँखों की तमाम जिंदा रौशनी
सब सफ़ेद की ही दौलत हैं।

जबकि काला रँग
सोच, समझ और बुद्धि को
अन्धकार के फेर में डाल देता है
समस्त तामसिक क्रियाएं जन्माता है
मैले ह्रदयों, कलुषित मस्तिष्कों का चहेता
सदा से दुश्मन है मानवता का।

काले रँग ने सदा फैलाई है
मानवबुद्धि पर जहालत की सियाही
जिसमें डूबती है मानवता सारी
युद्ध-रक्तपात-बलवे-गारतगर्दी
आदमी की आदमी पर बरतरी
मुल्कों, कौमों और नस्लों को
गुलामी की जंजीरों में जकड़े देखा है,
लालच की काली चुडैल की कोख से
घूस–घोटालों और बदनीयती को जन्मते देखा है।

चिरकाल से युद्ध जारी है
भलाई और बुराई के बीच
जिसके प्रतीक ये रँग है काले-उजले
गवाह है समय पुस्तक के फड़फड़ाते पन्ने।

रौशन विचारों से इन्कलाब जागता है
दबे–कुचले-पीड़ितों के लश्कर जब उठ खड़े होते हैं
दुम दबा कर अज्ञान का अन्धकार भागता है
तम कितना ही डरावना हो!
ज़ुल्म ओ सितम काली की रात के बाद
उगता है,
उजला सूरज सुहावना हो!

(रफत आलम)

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