भ्रष्टाचार की परिभाषा

भ्रष्टाचार के विरुद्ध
जंग लड़ने से पहले
स्पष्ट करना होगा
भ्रष्टाचार का अर्थ
तय करनी होगी इसकी परिभाषा
ताकि भूखा, नंगा और
खुले आसमान के नीचे
सोने वाला इन्सान कहीं
भ्रष्टाचार के अर्थ की
गिरफ्त में न आ जाए
और यदि ऐसा हुआ तो
प्रकृति-रुप सत्य पर भी
लग जाएगा प्रश्नचिन्ह
क्योंकि
भूखा, नंगा और बेघर व्यक्ति
यदि दिन रात मेहनत कर
रोटी, कपड़ा और मकान न कमा पाया
तो होगा सत्य-प्रकृति और
उसके अंश इन्सान पर
घोर अन्याय क्योंकि
रोटी, कपड़ा और मकान
इन्सान की वह कुदरती जरूरत है
जो उसे शरीर मिलने के साथ मिली है
शरीर प्रकृति का अंश है
शरीर टूटेगा तो
प्रकृति-नियम के प्रति
अन्याय होगा क्योंकि
शरीर प्रकृति है
भूखे नंगे और बेघर इन्सान को
इन्सान ही रहने दो
मेहनत करने का उसका हक
और मेहनत करके
कमाए जाने वाले
रोटी, कपड़ा और मकान को
उससे छिनने का प्रयास न करो
वर्ना वह डाका डालेगा और
चोरी भी करेगा
और तुम उसे भी
भ्रष्टाचारी कहोगे क्योंकि
तुमने अपने समर्थन में
जोड़ना है हर व्यक्ति
ताकि बड़ी भीड़ में
तुम्हे कोई आसानी से पहचान न सके
लेकिन याद रखो कि
भूखा. नंगा और बेघर आदमी
अपना शरीर तो बेच सकता है
अपनी आत्मा नहीं
कभी नहीं
वह बिके हुए शरीर होते हुए भी
तुमसे लाख दर्ज़े अच्छा है
क्योंकि उसने अभी तक भी
तुम्हारी तरह अपनी आत्मा नहीं बेचीं
और यह भूल जाओ कि
प्रकृति नियम
तुम्हारी भ्रष्टाचारी के रुप में
पहचान करने में असमर्थ होंगे
प्रकृति में
भूख और वासना का स्वरुप
स्वतः निर्धारित है
और तुम्हारा निर्दयी अन्त
तुम्हारी अपनी ही वासना से होगा
सत्य हमेशा सत्य ही रहेगा
क्योंकि भूख सत्य है
वासना नहीं
और तुम आज भी
हारे हुए हो
और कल भी
क्योंकि तुम वासना यानि
असत्य के रास्ते पर हो
और असत्य की हमेशा
हार होती है और
सत्य की हमेशा जीत !

(अश्विनी रमेश)

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8s टिप्पणियाँ to “भ्रष्टाचार की परिभाषा”

  1. bharashtachar ko mitane se pahle’
    is bat ko smjhana sach main bahut jaruri hai.

  2. टिप्पणी हेतु धन्यवाद !

  3. उत्साह्वर्दक एवं जागरूक करने वाला कविता |

  4. बहुत ज़बरदस्त पंडित जी…
    एकदम हर बारकी तरह
    वही शईस्तगी
    वही सीधी-सपाट बयानी
    वही खुलापन

    महसूस करो तो खुद-ब-खुद आदमी बहने लगता है…
    मुबारक…

  5. नेगी जी,
    कविता पर टिप्पणी हेतु धन्यवाद !

  6. लक्की जब तुम पढ़ लेते हो तो मुझे लगता है,कविता सफल हो गयी क्योंकि कविता को भी पाठक चाहिए !तुम्हारी टिप्पणी भी कविता से कम नहीं होती और इसे पढकर भी कविता जैसा आनंद आता है !

  7. अशोक जी,
    टिप्पणी हेतु हार्दिक धन्यवाद !

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