Archive for अगस्त 8th, 2011

अगस्त 8, 2011

लीडर : नरेश कुमार’शाद’

शाद साब ने कम वक्त में भी बहुत लिखा, रात दिन लिखा, खूब लिखा। बतौर विशेष इन सभी सच्ची रचनाओं में से एक हीरा पेश है। नज़्म लीडर सन 1958 के लगभग लिखी गयी थी जो आज के परिवेश में भी शाश्वत सत्य है।

तूने बेइल्म दिमागों के निहाखानों में
कीनओबुग्ज़ की मस्सुम सियाही घोली
और इंसान तेरे सहर से बेखुद होकर
खेलने लग गए अपने ही लहू की होली

कायनात अपनी रगें फाड कर चिल्ला उठी
निकहत आमेज़ फजाओं के कलेजे धडके
खून  उगलने लगी मद्कूक  इबादतगाहें
आसमां बोस इमारात से शोले भडके

ओ फसुंसाज़! यह माना तेरा मज़हब का फसुं
आज चलता है हमेशा तो नहीं चल  सकता
मज़हब और कौम की गिरती हुई दीवारों से
कहत और भूख का तूफ़ान नहीं टल सकता

जंग आलूद सही फिर भी अवामी जज्बे
रंग और नस्ल के पाबंद रहेंगे कब तक
और सदियों के सियहबख्त सितमखुर्दबशर
नित नए ज़ुल्म नए जोर सहेंगे कबतक

कायदे कौम! ज़ुनुखेज़ फजाओं से  न  खेल
लाल परियों के छलकते हुए ख्वाबों में न झूम
वक्त की एक  ही करवट के बदल जाने से
तेरी जानिब भी लपक सकते हैं भूखों के हूजूम

[ बेइल्म : अशिक्षित, निहाखानों : रिक्त मस्तिष्क, कीनओबुग्ज़ : ईर्ष्या-द्वेष, मस्सुम-विषैली,

सहर : जादू , बेखुद : आपा खोकर, कायनात : संसार , निकहत आमेज़ फजाओं : सुगंध पूर्ण बहारों,

खून उगलने लगी मद्कूक इबादतगाहें : क्षय रोगी सामान खून बहाने लगे पूजा स्थल,

आसमां बोस इमारात : आकाशचुम्बी ऊँची अट्टालिकाएं, फसुंसाज़ : जादूगर , फसुं-जादू कहत :अकाल,

जंग आलूद : जंगलगे, अवामी जज्बे :जन भावनाएं. सियहबख्त : अभागे,

सितमखुर्दबशर :अत्याचार पीड़ित आदमी, कायदे कौम : लीडर, ज़ुनुखेज़ :दीवानी,  हूजूम : भीड़]

…………..
प्रस्तुती : रफत आलम

अगस्त 8, 2011

अदभुत चाँद

बाईस नवम्बर उन्नीस सौ निन्यानवे का चाँद
अभी-अभी देखकर लौटा हूँ
शेरटन होटल के सामने से
दिन बुधवार
शाम के साढ़े सात बजे हैं।
अंतरिक्ष का भेद बताने वालों ने बताया था पहले से कि
यह चाँद अब तक दिखने वाले चाँदों में
सबसे बड़ा दिखेगा।

पूरा चाँद
एक थाल…नहीं,
एक परात बराबर
लगा कि मेरी दादी ने उसे
राख से माँज दिया हो।
मैंने अपनी दादी को नहीं देखा
मगर आज चाँद को देखकर लगा कि
दादी को देख लिया।
माँ कहती है कि
मेरे जन्म के तीन महीने बाद ही दादी गुजर गई।
लेकिन आज चाँद को देखते ही
वह सब याद आया जो दादियाँ सुनाती आयी हैं।

चाँद की सीमाओं में धान कूटती बुढ़िया
चूल्हे के पास से परथन के बराबर पड़े गुंथे आटे में
दाँत मारती चुहिया
सुना हुआ सब कुछ मुझे आज के चाँद में दिखा।
सुना हुआ न दिखता तो कितना विकृत और विद्रूप लगता
सुने हुए में कल्पना समाहित होती है।
आज का परात बराबर चाँद
मैंने बचपन में अपने गाँव की
बहन-बेटियों की शादी में देखा था
उसमें रखकर सब्जियाँ और पूरियाँ परोसते थे लोग
आज लगा कि उसी परात को दादी ने
राख से माँज दिया है।
यह बाईस नवम्बर उन्नीस सौ निन्यानवे का चाँद है
रोज से बड़ा और रोज से साफ।

{कृष्ण बिहारी}

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