Archive for अगस्त 6th, 2011

अगस्त 6, 2011

चंद कतात : नरेश कुमार ’शाद’

कोई दुनिया में अब नहीं मेरा
मेरे बारे  में  लोग  कहते  हैं
मैं, मेरा दर्द, मेरी  तन्हाई
जब के हर वक्त साथ रहते हैं
…………

सलहा-साल की तलाश के बाद
जिंदगी  के चमन से छाटे हैं
आपको चाहिए तो पेश करूँ
मेरे दामन  में चंद  काँटे  हैं

(सलहा : साल, वर्ष)
……………….

मैंने हर गम खुशी में ढाला है
मेरा  हर  चलन  निराला  है
लोग जिन हादसों से मरते हैं
मुझको उन हादसों ने पाला है
…………..

हर कली मस्ते खवाब हो जाती
पत्ती-पत्ती  गुलाब  हो  जाती
तुने डाली  न मैं-फ़शाँ  नज़रें
वरना शबनम शराब हो जाती

(मैं-फ़शाँ : मादक, नशीली)

प्रस्तुती : रफत आलम

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अगस्त 6, 2011

कशमकश : नज़्म (नरेश कुमार ’शाद’)

सोचते सोचते फिर मुझको ख्याल आता है
वो मेरे रंजो–मसाइब का मदावा तो न थी
रंग अफ़्शा थी मेरे दिल के खलाओं में मगर
एक औरत थी इलाजे गम दुनिया तो न थी

मेरे  इदराक  के  नासूर तो रिसते  रहते
मेंरी होकर भी वो म्रेरे लिए क्या कर लेती
हसरत  ओ यास के गम्भीर अँधेरे में भला
एक नाज़ुक सी किरण साथ कहाँ तक देती

उसको रहना था ज़र-ओ-सीम के एवानों में
रह भी जाती वो मेरे साथ तो रहती कब तक
एक मगरूर साहूकार की प्यारी बेटी
भूख और प्यास की तकलीफ सहती कब तक

एक  शायर  की तमन्नाओं को धोखा  देकर
उसने तोड़ी  है अगर प्यार भरे गीत  की लय
उस पे अफ़सोस है क्यों उसपे ताज्जुब कैसा
यह मुहब्बत भी तो अहसास का इक धोखा है

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रंजो–मसाइब : दुःख-दर्दों,   मदावा : इलाज,   रंग अफ़्शा  : रँग भरती,    खलाओं : रिक्त स्थानों,  इदराक : सोच/अक्ल,

हसरत-ओ-यास : आशा-निराशा,   ज़र-ओ-सीम के एवानों : सोने चांदी के महलों,     मगरूर : घमंडी/गर्वित

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प्रस्तुती : रफत आलम

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