गुलाबी दुपट्टा

ऐसी ही भीगी रातों में
कांपते थे हाथ, दिल और दिमाग
जब परत दर परत
जिस्मों के तलिस्म खुलते थे।

अधखुली पलकों में
ठहर जाती थी रात
होठों के जाग उठे उभारों पर
सियाह बदलियाँ अमृत बरसा जाती थी।

चाहत की मदिरा पीकर
मदहोश हो जाता था अहसास
विस्मरति के भवँर में डुबाते
आत्मबोध के वे लम्हे
शरीर के बंधनों से परे
आत्माओं का मिलन करा जाते थे
जहाँ अंतर मिट जाता है
मैं और तू के बीच
वही पल तो थे अपनी पहचान के।

आज भी खुल कर बरस रही है घटा
खिड़की के गीले शीशों से परे
धुंधला गए है सब मंज़र
उसी तरह के जब
मैंने माटी के अंधे घर में छोड़ा था तुम्हे।

साथ गुज़ारे लाखो लम्हे
एक साथ जल रहे थे
सुन्न हो गये ज़हन के अलाव में
आखों के चश्मे में भाप थी मगर
उस रोज रो कब पाया था मैं।

सुहाग का जोड़ा पहने
दूर जाते,
बहुत दूर जाते देखता रहा था तुम्हे,
तब से एक गुलाबी दुपट्टा
मेरे ख्यालों में लहरा जाता है अक्सर
सुहाने मौसमों में रुला जाता है अक्सर।

(रफत आलम)

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