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जुलाई 14, 2011

लहूलुहान हैं फिर मुम्बई, देश और इंसानियत

मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है
परन्तु
प्लेट-ग्लास-बर्तन तोड़ने के सिवा
क्या कर सकता हूँ?

मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है
उस बेईमान-लचर और नपुंसक व्यवस्था पर
जिसे
हमारे क्षत-विक्षत अंगों में धँसे
बोल्ट और छर्रे नज़र नहीं आते
ना सुने जाते है
कायर बमों के धमाके
हर बार दुश्मन को अंतिम चेतावनी देकर
मंत्री- कारिंदे– चाटूकार सब
घोटालों की नींद में सो जाते हैं।

मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है
क्यों नहीं मुझे लावारिस
थैले-पैकेट नज़र नहीं आते
सुरक्षा के मुहाफिज़ तो
ए.के-47 की जगह
लाठियां हाथों में लिए
चरस–स्मैक और दारु के ठिकानों से
हफ्ता वसूली में लगे हैं
या मोटी तोंदों वाले सफेदपोशों की
हिफाज़त कर रहे हैं।

मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है
पर क्या करूँ?
…क्या करूँ?
सर झुकाने के सिवा…!
………….

लहूलुहान फिर शहर है क्या किया जाए
खोट अपने ही भीतर है क्या किया जाए
बस हम ही नहीं हैं खुद निगेहबान अपने
अदू की हम पे नज़र है क्या किया जाए

अदू ==दुश्मन

(रफत आलम)

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