दिल की लगी

फ़िक्र बहुत थी हमें दुनिया जहान की
सर पे गिरी छत अपने ही मकान की

दिल से दुआ हो हर एक मेहमान की
अल्लाह इज़्ज़त रखे मेरे मेज़बान की

किसी ने कुत्तों में खोजी वफ़ा की बू
वो समझ गया था फितरत इंसान की

कौन समझा दिल की कतरनों का दर्द
लोग तो कैंचियाँ चला गए ज़बान की

रिश्ते बहुत थे मगर कौन से रिश्ते थे
हमने जिनके वास्ते दुनिया वीरान की

मुस्कानों का बहरूप धरे अपनी काया
असल में बस्ती है जंगल बयाबान की

गुलशन के उजड़ने में किसका है दोष
मौसम का फरेब के भूल बागबान की

दीवाने तो तिरछी चितवन पे मर मिटे
ज़रूरत कहाँ पड़ी प्यारे, तीर-कमान की

सर इबादत से उठे ही कब दीवानों के
सजदों को ज़रूरत कहाँ थी अज़ान की

यूँ तो ज़मीन माटी का गोला है मगर
उठाए फिर रही है बुलंदी आसमान की

हमने कब कहा ये है गज़ल ऐ आलम
है दिल की लगी जो दिल ने बयान की

(रफत आलम)

5 टिप्पणियाँ to “दिल की लगी”

  1. “सर इबादत से उठे ही कब दीवानों के सजदों को ज़रूरत कहाँ थी अज़ान की”

    यहाँ से जैसी दिखती है…शानदार गज़ल बनी है रफत जी

  2. रफत साहब,एक बेहतरीन ग़ज़ल के लिए शुक्रिया.बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आया और खुबसूरत पंक्तियाँ पढ़ कर आनंद आ गया.आपसे उअही गुजारिश है कि आप पुनः फेसबुक पर भी आयें,वहां आपकी कमी काफी खल रही है.सादर.

  3. कल 30/08/2011 को आपके दिल की बात नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  4. फ़िक्र बहुत थी हमें दुनिया जहान की
    सर पे गिरी छत अपने ही मकान की

    दिल से दुआ हो हर एक मेहमान
    किसी ने कुत्तों में खोजी वफ़ा की बू
    वो समझ गया था फितरत इंसान कीकौन समझा दिल की कतरनों का दर्द
    बेहद शानदार दिल को छूती गज़ल्।

    लोग तो कैंचियाँ चला गए ज़बान की
    बेहद

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