Archive for जुलाई 11th, 2011

जुलाई 11, 2011

एक दुनिया यह भी है

क्लास रुम की खिड़की से भी
दिखती है एक दुनिया
एक दुनिया यह भी है…
सीमेंट के मैदान पर
चहकते बच्चे
खेलते-कूदते पसीने में
महकते बच्चे
आदमी और औरत की
डालियों से खिले फूल हैं ये।
भारतीय, सोमालियन, पाकिस्तानी…बांग्लादेशी बच्चे…
बच्चों के माथे पर देश नहीं
बचपन राष्ट्रीयता है।

एक दुनिया यह भी है…

स्कूल में एक नया ब्लॉक
बनकर तैयार होने को है
दरवाजे, खिड़कियाँ, शीशे लगाते
मजदूर थके-थके से हैं।
और पुताई की डबल कोटिंग करता हुआ आदमी
काम रोककर सोने को है
निरक्षर और अनपढ़ मजदूरों की यह निर्मति
वर्षों तक
साक्षर देती रहेगी दुनिया को।

यह भी एक दुनिया है…
एक दुनिया यह भी है…

बच्चों की उत्सुक आँखों में
काम करते मजदूर और
मजदूरों की भावुक आँखों में
एक-सी यूनिफॉर्म पहने बच्चे हैं।
बच्चों ने कभी काम नहीं किया
मजदूर कभी स्कूल नहीं गये
इनकी दुनियाओं में कोई परिवर्तन
अब हो भी नहीं सकता।

एक दुनिया यह भी है…

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 11, 2011

कार्य कलात्मकता आनंदमयी जीवन

किसी भी
कार्य करने से पहले
तुम्हारे मन का
यह पूर्वाग्रही विचार
कि यह कार्य
तुमने पहले भी किया है ,
तुम्हारे लिए कोई नया नहीं
तुम्हारी रचनात्मकता
तुम्हारी कलात्मकता को
दबा देता है
और
हर कार्य नया होते हुए भी
तुम सोचते हो
यह तुमने पहले भी किया है
यदि तुम अभी
दौड़ लगा रहे हो तो
फिर यह नहीं कह सकते कि
कल भी तुम
ठीक ऐसे ही दौड़े थे
जैसा कि आज
दौड रहे हो
यह इसलिए कि
तुम्हारी कल की दौड
और अभी आज की दौड
बिल्कुल भिन्न है
इसका रोमांच, आनंद
बिल्कुल नया
यदि तुम कल की दौड
भूलकर
आज अभी की दौड
एकाग्र, तल्लीन होकर
दौड रहे हो
अनुभव
यानि
अभ्यास का विचार
कला सधने का
विचार न होकर
कला के प्रति
रूचि, ताजगी
खो देने का
और कर्ता को
कार्य के प्रति यांत्रिक बना देने
और
हर नए कार्य को
पुराना समझने का विचार है
कला में
सततता है
कला….
प्रकृति अनुगामिनी
रुपपरिवर्तिता
आनंददायिनी है
कला जीवन का
ऐसा ही पर्याय है
जैसा व्यक्ति में
चल रही साँसे
और
रक्त-धमनियों में
ताज़ा हो रहा रक्त संचार
शरीर के
ताज़ा और प्रफुल्लित
होने का पर्याय है!

(अश्विनी रमेश)

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