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जुलाई 6, 2011

बोरियत

सुनहरी चाय के प्याले से उठती
अदरक और चाय की मिली-जुली
सुगंधित भाप
सुहानी प्रतीत हुयी
पर कप उठा चुस्की
लेने के बजाय
हाथ से ढ़क दिया प्याले को।

गर्म गर्म भाप ने हथेली को
गरमा दिया,
भीगा दिया
ताप बहुत देर सहन नहीं हुआ
हथेली की कोमल त्वचा से,
हठा कर देखी हथेली तो
भाप की नमी ने
एक भीगे वृत का रुप ले लिया था ।

कितना अच्छा लग रहा है वह वृत और
उसके अंदर कैद रेखायें
रेखायें हाथ की भीग कर और स्पष्ट हो गयीं
पर क्या गीली होकर चमकती भाग्य रेखा की
भाँति किस्मत भी ऐसे ही किसी भी क्षण
चमक जाती होगी?

क्या जीवन रेखा, भाग्य रेखा, ह्रदय रेखा और
तमाम अन्य रेखाओं
और पर्वतों, त्रिभुजों, वर्गों, वृत्तों, त्रिशूलों एवम शंखों का
यूँ स्पष्ट हो जाना
जीवन से कुछ वास्तविक सम्बंध रखता है?

कुछ देर में तो भीगापन सूखकर गायब हो जायेगा
कुछ और देर बाद वृत के निशान भी मिट जायेंगे
रेखाऐं फिर से धुँधली पड़ जायेंगीं।
फिर क्या था इसका मतलब?

दिमाग ने झुँझला कर उल्टे ही प्रश्न कर डाला
क्यों रखा था हाथ प्याले पर?
रखा तो रखा
पर सोचा क्यों इतना
इस सब पर?
क्या सब व्यर्थ था?

क्या दिमाग बेकार की बातें भी सोच सकता है?
या कि यह
और ऐसे सब क्रिया-कलाप
बाय-प्रोडक्ट होते हैं
बोरियत के?

…[राकेश]

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