मैं और मेरी प्रवासी दुनिया

मेरे साथ था एक छोटा-मोटा जुलूस
जब मैंने पहली बार
छोड़ा था देश
नादान दोस्तों से लेकर
दानेदार दुश्मन तक
सभी आये थे
स्टेशन तक छोड़ने मुझे।
आँखों में आँसू
और उनके आगे थी मेरी धुँधलाती दुनिया
जो ट्रेन के चलते ही
दिखने लगी थी साफ-साफ।

फूल मालायें और
बाहों के बंधन
सब कुछ बहुत भावुक
और बहुत करुण था।

मैंने आखिर तक
की भी बहुत कोशिश
कि माँ ने जो
विदा के समय लगाया था तिलक
दही और चावल का
वह पुछ न पाये।

मगर क्या हो पाया वैसा
जहाज में चढ़ने से पहले
बहुत जोर से उठी हूक
उमड़े आँसू और फिर
धूमिल होने लगीं
धीरे-धीरे करुण कठोर स्मृतियाँ।

बरस-दर-बरस
गये बीत
आते जाते हिंदुस्तान
आना जाना मेरा
बन गया एक ढ़र्रा
अब न कोई
एयरपोर्ट आता है
न स्टेशन।

अब नहीं लिखता कोई
मुझे याद करते भीगे पत्र
नहीं भेजता कोई
नव वर्ष का कार्ड
और अपनी ताज़ा तस्वीर।

बरसों बीत गये
यह वक्त्त एक युग से कम तो नहीं!
नहीं मालूम मुझे
कि मैं और मेरी दुनिया में
कौन हो गया है अकेला।

{कृष्ण बिहारी}

4 टिप्पणियाँ to “मैं और मेरी प्रवासी दुनिया”

  1. परिवर्तनशील आदत और व्‍यवहार, लेकिन मन कब मानता है.

  2. मर्मस्पर्शी एवं उम्दा

  3. marmsparshi , dastoor hai duniya ka , aur ham bhi kya us bojh ko uthhaye chal sakte hain …

  4. बदलता वक्त्त, सबके जीवन की अपनी अपनी गति एवम दिशा बदलाव लाती ही लाती है।
    अपेक्षायें बदल जाती हैं। दूरी कुछ नयी स्थितियां उत्पन्न कर देती है व्यक्तियों के मध्य

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