उदारीकरण और भारत

बतकही : आरम्भ और
सोनिया गाँधी और संघ परिवार से आगे
:-
9 जनवरी, 2005

तीनों लोग धीरे धीरे चलकर पार्क में पहुँच गये। एक तरफ कुछ बच्चे टेनिस की बॉल से क्रिकेट खेल रहे थे। तीनो लोग पार्क के दूसरे कोने की और बढ़ गये जहाँ सीमेन्ट की बैंचें भी लगी हुयी थीं।
तीनों ने बैंचों पर न बैठकर नीचे घास में ही आसन जमा लिया। हरीश बाबू तो अपनी दायीं करवट से लेट ही गये और ​िसर को दायें हाथ के सहारे से उठा दिया। विजय बाबू ने बैठकर अपने दोनो हाथों को शरीर से पीछे जमीन पर टिका दिया।

अशोक बाबू सुखासन की मुद्रा में बैठ कर बोले ये विकास प्राधिकरण द्वारा विक​सित कालोनियों में ये बात अच्छी है कि ये पार्क आदि के लिये प्रावधान रखते हैं। कभी कभार यहाँ आकर बैठना हो जाता है और बच्चों को खेलने की जगह मिल जाती है वरना सड़क पर खेलते रहते हैं।

ये बात तो है ही। फिर सारी चीजें पूर्वनियोजित रहती हैं ऐसी परियोजनाओं में। नब्बे डिग्री पर आपस में काटती सड़के मिलती हैं। सीवेज ​सिस्टम पहले से मिलता है। फिर अपनी इस कालोनी के तो बहुत सारे फायदे हैं। शहर के कोलाहल और प्रदुषण से दूर। बस एक परिवहन की समस्या है यदि अपना वाहन खराब हो या न हो तो शहर जाने की दिक्कत है। पर ये भी दो तीन सालों में ठीक हो जायेगा। विजय बाबू ने कहा।

कुछ सालों में नहीं विजय बाबू। साल भर में ही। आपको पता है मेन रोड से जो डबल लेन हमारी कालोनी की तरफ आ रही है वहाँ शुरूआत में ही ​स्थित बाग वाली जमीन का विवाद सुलझ गया है और जमीन बिक गयी है। वहाँ जल्दी ही एक मल्टीप्लैक्स और एक शापिंग मॉल बनने वाला है। हरि बाबू ने सूचित करते हुये कहा।

अजी वो आम के बाग वाली जमीन की बात तो नहीं कर रहे आप। वो तो जमीन ही करोड़ों की है, किसने ले ली? अशोक बाबू ने अचरज प्रकट किया।

हाँ जी वही जमीन जो कारगिल मे शहीद हुये मेजर के नाम पर खुले पैट्रोल पम्प के पीछे है। ऐसा सुना जा रहा है कि जो उद्योगपति इस बार एम.पी. की सीट के लिये चुनाव में खड़ा हुआ था, उसी ने सारी जमीन खरीदी है। हरि बाबू ने आगे बताया।

इनका क्या है, धनी लोग हैं। जो चाहे खरीद लें जो चाहे बना लें जैसा चाहे बना लें। दिक्कत तो आम आदमी की है। यदि मकान में एक खिड़की भी बाद में अतिरिक्त बनवानी पड़ जाये तो ये प्राधिकरण और नगर निगम वाले खून पी जाते हैं आदमी का कि आपने बना कैसे ली बिना उनकी मंजुरी के। विजय बाबू ने कहा।

बात आप सही कह रहे हो जनाब। हमारे घर से दो मकान छोड़कर विकास प्राधिकरण का इंजीनियर रहता है। उसने पूरे मकान का नक्शा ही बदल दिया है कौन उसे कहने आयेगा। और एक हमारे पीछे पेपर मिल का इंजीनियर रहता है। बेचारे ने पीछे वाली खाली जमीन पर दो कमरों का सैट बनवा लिया ये सोचकर कि प्राइवेट नौकरी है और कम्पनी की हालत डांवाडोल चल रही है। बन्द भी हो सकती है और ऐसा हो गया तो नये बनाये दो कमरे किराये पर दे देगा।
एकदम से दूसरी नौकरी मिले न मिले। उसे रूला मारा प्राधिकरण वालों ने। मेरे पास आया था सोचकर कि शायद मेरी पहचान होगी विकास प्राधिकरण के इंजीनियर से। हम गये भी पर इससे बस इतना हुआ कि जो पैसा उससे माँगा जा रहा था उसमें कुछ घटोत्तरी हो गयी। हमारी तो समझ में आता नहीं कि जब प्राधिकरण मकान बेच दिये पीछे की खाली जमीन के भी पूरे पैसे लेकर तो अब खरीदने वाला आदमी कुछ भी करे उस जमीन का चाहे तो अमरूद के पेड़ लगाये या ताजमहल बनाये। उसकी मर्जी। भाई अगर कोई ऊपर की मंजिल बना रहा है या मकान के आगे की सरकारी जमीन हड़प रहा है तब तो विरोध की बात समझ में आती है पर जिस जमीन का पैसा प्राधिकरण पहले ही ले चुका है उस पर निर्माण करनें से उनके पेट में दर्द क्यों होता है? अशोक बाबू गुस्से में बोले।

इन सरकारी दफतरों का हिसाब ऐसा ही है। जहाँ जिसे जो पावर मिली हुयी है वह उसी का रोब दिखाकर कमाई कर रहा है। इन दफतरों के चक्कर में फंस कर अच्छा भला आदमी पागल हो जाये। आदमी को ये इतने कानून बता देंगे कि आदमी उस काम से ही तौबा कर लेगा। यहाँ अपने देश में तो एक ही चीज चलती है मुद्रा। पैसा दो और काम कम बाधाओं के साथ कराओ। घूस लेना देना फैशन हो गया है और अब तो लगता ही नहीं कि कोई ऐसा विभाग भी होगा जहाँ आज भी बिना धन दिये काम हो सकता हो। विजय बाबू ने कहा।

अजी आप लोगों को भले ही पसन्द न हो भाजपा पर भाजपा के राज में ही इंस्पेक्टर राज खत्म हो रहा था। सब तरह के कंट्रोल सरकार हटा रही थी। पहले रसोई गैस सिलिन्डर का क्या हाल था बुक कराने के कितने समय बाद कनेक्शन मिलता था अब आज के आज ले लो। पहले स्कूटर बुक कराने के सालों बाद स्कूटर घर में आ पाता था आज एक दिन में बीस स्कूटर आप खरीद लो। ऐसा ही टेलिफोन के साथ है। भाजपा ने सोने की तस्करी का तो धंधा ही बंद करा दिया। सड़कों वाली स्वर्णिम चतुर्भज परियोजना को ही देख लो। आठ आठ लेन के हाइवे। कुछ साल और भाजपा रह जाती तो इतना चमका जाती देश को कि विश्व शक्ति तो भारत दस सालों में ही बन जाता। अशोक बाबू गर्व से बोले।

अजी दस साल कहाँ। भाजपा ने तो भारत को पिछले लोकसभा चुनावों में ही चमका दिया था। आप भूल गये क्या “इंडिया शाइनिंग” को? हरि बाबू ने मुस्कुराते हुये कहा।

अशोक बाबू को अपनी ओर देखता पाकर वे आगे बोले ऐसा नहीं है कि भाजपा ने काम नहीं किया। पर जितने आपने काम गिनाये उनमें से बहुत सारे काम या तो राव सरकार में शुरू हो गये थे बल्कि कुछ योजनाओं पर अमल तो राजीव गांधी ही शुरू करवा चुके थे जैसे टेलिफोन की बात आपने की। भारत में दूरसंचार क्रान्ति राजीव गांधी की देन है। इसी काम के लिये राजीव ने अमेरिका से सैम पित्रोदा को बुलाया था। सी डॉट आप भूल गये क्या। उस समय कितनी आलोचना राजीव की होती थी कि वह पित्रोदा जैसे टैक्नोक्रेट पर देश का पैसा लुटा रहे हैं। स्वर्णिम चतुर्भज सड़क परियोजना का पूरा खाका राव सरकार तैयार कर चुकी थी और ये हो सकता है कि बाद की संयुक्त मोर्चे की सरकारें इस पर अमल न कर पायी हों और राव सरकार द्वारा बोयी फसल भाजपा ने काटी। ये सब भी ठीक है पर दिक्कत तब आती है जब आप जब आप योजना बनाने वाले को इतना श्रेय भी न दो कि कम से कम उसने सोचा तो कि ऐसा हो सकता है। आप ही बताओ जब भाजपा ने किसी भी अच्छे काम का श्रेय अपने पूर्ववर्तियों को नहीं दिया तो भाजपा को कौन श्रेय देना चाहेगा।

विजय बाबू ने हरीश जी की बात समाप्त होते ही कहा आप एकदम लेटस्ट बात लो अशोक बाबू। अभी पिछले दिनों राव साहब का देहान्त हुआ और अटल जी ने कहा कि परमाणु विस्फोट की सब रूपरेखा राव के समय में ही बन गयी थी और तैयारी पूरी थी पर राव सरकार किसी कारण से ​विस्फोट नही करा पायी। अटल जी ने कहा कि जब वे पी0एम बने तो राव ने उनके हाथ में एक पर्चा दिया था जिस पर लिखा था कि सब तैयारी है आप आगे बढ़कर श्रीगणेश करें। अब अटल जी ने करीब छह साल सरकार चलायी और कितनी ही बार ऐसी बातें उठीं की कितनी ही ऐसी योजनायें हैं जो राव सरकार के समय में या तो निर्धारित हो गयीं थीं या शुरू हो गयी थीं और इन बातों का श्रेय राव सरकार को मिलना चाहिये पर न तो भाजपा ने न ही अटल जी ने ऐसी किसी बात का स्वागत किया बल्कि संघ परिवार इसी बात को गाता रहा कि भाजपा भाजपा के राज से पहले भारत में कुछ नहीं हुआ और देश गर्त में जा रहा था और पुरानी सब सरकारें बेकार थीं खास तौर पर कांग्रेस की सरकारें। अब अटल जी का बहुत पुराना सम्बंध राव साहब से रहा है और हो सकता है कि मित्र के देहान्त पर शोकाकुल होकर अटल जी ने भावावेश मे सच कह दिया हो और इस बात का आज की राजनीति से कोई मतलब न रहा हो। पर जब कहने का समय था तो अटल जी ने ये बात नहीं स्वीकारी। हमारी तो अटल जी से ये शिकायत रही ही है कि वे बात को तभी स्वीकारते हैं बाद में जब उस बात का कोई मतलब नहीं रहता और जब बात स्वीकारने का महत्व था तब वे राजनीति के दबाव के कारण चुप्पी साधे बैठे रहे। कितने ही ऐसे मामले हैं उनके छह साल के शासन में।

देखो जी भाजपा ने भारत को सड़े गले समाजवादी विचारों से और बाजार को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराया। अशोक बाबू कुछ हठधर्मिता के साथ बोले।

उदारीकरण तो राव सरकार के समय डा. मनमोहन ​सिंह ने शुरू कर दिया था और भाजपा और अन्य विपक्षी दल तब पानी पी पीकर उदारीकरण को कोसते थे। ढंग से याद नहीं आ रहा किस विपक्षी नेता ने संसद में कहा था कि राव साहब आप और मनमोहन ​सिंह जी आप सुन लें आने वाली पीढ़ियाँ आप दोनों को कभी माफ़ नहीं करेंगीं। हरि बाबू ने कहा।

अजी विपक्ष में रहकर सरकार का विरोध तो करते ही हैं राजनीतिक दल। भाजपा ने भी कर दिया होगा उदारीकरण का विरोध शुरू में। पर मुख्य बात तो ये है कि जब भाजपा की सरकार बनी तो उसने बाजार को उदार बनाया या नहीं। अशोक बाबू कुछ समझौते के स्वर में बोले।

विजय बाबू ने भी सहमति में ​सिर हिलाते हुये कहा कि ठीक कह रहे हो आप हमारे राजनीनिक दल सत्ता में रहकर एक ढ़ंग से व्यवहार करते हैं और विपक्ष में रहकर दूसरे ढ़ंग से। बल्कि कई बार तो अपनी ही सरकार द्वारा चलाये कार्यक्रमों का भी विरोध करने लग जाते हैं जब वही काम दूसरी सरकार चलाये रखना चाहती है। पर इन राजनीतिक चालबाजियों से अलग बात करूं तो जब इन्दिरा जी की सरकार फिर से बनी थी जनता पार्टी के शासन के बाद तो सन उन्नासी या सन अस्सी में ही इन्दिरा जी ने स्वराज पॉल को अनुमति दी थी भारत में उद्योगों में पैसा निवेश करने की और स्वराज पॉल ने अच्छी खासी रकम दो भारतीय उद्योगों में लगायी थी। याद नहीं आ रहा किस ग्रुप के उद्योग थे पर भारतीय उद्योगपति इतने सीधे हैं नहीं। उन्होने स्वराज पॉल के पौण्डस तो लगवा लिये थे अपने उद्योगों में पर उन्हे शेयर देने के समय मुकर गये थे और घबराकर या चालाकी में कोर्ट में चले गये थे। स्वराज पॉल का तो पैसा ही डूबा पर इन्दिरा गांधी के भारतीय बाजार में उदारीकरण लाने के प्रयासों पर तो पानी फिर गया वरना भारत भी चीन की तरह अपने बाजार विश्व के लिये सन अस्सी में ही खोल देता और भारत को सन नब्बे के शर्मनाक दौर से न गुजरना पड़ता जब विदेशी मुद्रा के लिये देश को सोना गिरवी रखना पड़ा।

सही कह रहे हो आप। भारतीय उद्योगपति बहुत चालाक रहा है। जब इनके पास इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं था तो इन्होने सरकार को खूब सराहा बड़े बड़े सार्वजनिक उपक्रम खड़ा करने के लिये ताकि इन्हे सस्ते रॉ मैटिरियल मिलते रहें और सालों तक ये लोग खुद चाहते रहे थे कि बाजार पर सरकार इस तरह से नियंत्रण रखे जिससे दूसरे लोगों को लाइसेंस न मिल सके उस उत्पाद को बनाने का जिसे ये बनाते रहे हैं और उनकी मोनोपॉली चलती रहे। अब जब हर तरफ वैश्वीकरण का जोर है और ये लोग बिना किसी मल्टीनेशनल कम्पनी से गठजोड़ किये बाजार में रह नहीं सकते क्योंकि नयी तकनीक तो इन्होने विक​सित की नहीं कभी भी तो अब ये सरकार को कोसते हैं। पुराने ​सिस्टम को कोसते हैं। और हर गलत चीज सरकार के माथे मढ़ देते हैं। मानो इनके उद्योगों में शोध एवं विकास का कार्य करने भी उद्योगमंत्री जाता। हरि बाबू ने कहा।

हाँ कांग्रेस के जमाने में भारत में एक ही कार एम्बेस्डर बनती थी और उससे छूटो तो फियेट मिलती थी आज देखो बाजार अटा पड़ा है तरह तरह की कारों से। अशोक बाबू ने कहा।

अशोक जी मारूति भी कांग्रेस सरकार की ही देन है। इसके लिये सजंय गांधी की अच्छी खासी फजीहत हुयी थी विपक्ष द्वारा। जैसे राजीव गांधी की ऐसी तैसी कर रखी थी तब के विपक्ष ने कम्पयूटर के नाम पर कि देश का पैसा बिना मतलब ऐसी मशीनों पर खर्च किया जा रहा है जिनकी भारत को जरूरत ही नहीं है। आज मारूति सबसे ज्यादा कारें बेच रही है और निर्यात भी कर रही है। और कम्पयूटर का क्षेत्र विक​सित न होता भारत में तो जो नवयुवकों की फौज सॉफ्टवेयर आदि के काम में जुटी पड़ी है इसे कहाँ से तो रोजगार मिलता? आज तो ये लोग देश विदेश में झंडे गाड़ रहे हैं पर तब क्या होता? । हरि बाबू ने कहा।

अशोक बाबू ने भी हामी भरते हुये कहाये तो बात है। चाहे ​सिविल इंजीनियरिंग का स्टुडैन्ट हो या मैकेनिकल का नौकरी सब सॉफ्टवेयर में कर रहे हैं । विजय बाबू को सोच में डूबा देखकर उन्होने पूछा आप किस सोच में पड़ गये?

मैं ये सोच रहा था कि सारी सरकारें सार्वजनिक उपकरणों को क्यों बन्द करना चाहती हैं? अब ये नये पेटेन्ट कानून का हल्ला उड़ा हुआ है कि इसके लागू होने के बाद दवाइयों के दाम आसमान छूने लगेंगे। अच्छा खासा आइ.डी.पी.एल था। जीवनरक्षक दवाइयां बनाता था और इस और इस कारण बाजार में ऐसी दवाइयों के मूल्य पर नियंत्रण रहता था। सरकार ने घाटे के नाम पर बन्द करा दिया सारा का सारा आइ.डी.पी.एल जबकि उसकी सब यूनिटें तो घाटे में थी नहीं। जो घाटे में थीं उन्हे बन्द कर देते। वैसे भी नेहरू के समय आइ.डी.पी.एल कोई लाभ कमाने के लिये तो लगा नहीं था। बाजार में जीवनरक्षक दवाइयों की आपूर्ति करना और कीमतों पर नियंत्रण रखना ये दो उददेश्य थे।

अजी सरकारी कम्पनियों के साथ सौ बबाल होते हैं। कितने ही सरकारी विभाग ऐसे होंगे जिन पर कम्पनी का बकाया होगा क्योंकि कोई भी सरकारी विभाग दूसरे सरकारी विभाग को समय पर भुगतान तो करता नहीं। और हमें तो पता चला था कि दवाई बनाने के मामले में तो कम्पनी अच्छी थी पर अपनी दवाइयां बेच नहीं पाती थी बाजार में। हरि बाबू ने कहा।

बेचती भी कैसे। प्राइवेट कम्पनियाँ तो डाक्टरों को कमीशन दे सकती हैं गिफ्ट दे सकती हैं जिससे डाक्टर लोग उनकी बनायी दवा को मरीजों को रिकमेन्ड करें। सरकारी कम्पनी कहाँ से कमीशन और गिफ्ट देगी। आइ.डी.पी.एल ने भी मार्केटिंग में मात खायी होगी। हमने तो सुना है कि एक प्राइवेट दवा कम्पनी आइ.डी.पी.एल से बल्क में दवा का पाउडर खरीदती थी। कैपसूलेशन अपने आप करती थी और अस्सी के दशक में एक कैपसूल साढ़े तीन रूपये का बेचती थी। जबकि आइ.डी.पी.एल का उसी दवा का अपना बनाया कैपसूल पिच्चहत्तर पैसे या एक रूपये में मिला करता था पर तब भी डाक्टर प्राइवेट दवा कम्पनी वाले कैपसूल को खरीदने को कहते थे। इन सार्वजनिक उपकरणों का मैनेजमैंट भी सुस्त रहा होगा जो अपनी दवाओं की मार्केटिंग प्राइवेट कम्पनियों से ठेके पर नहीं करवा पाये। विजय बाबू बोले

अरे सरकारी कर्मचारी काम कहाँ करके देते हैं। फिर यूनियनबाजी। पचासों अन्य कारण रहे होंगे घाटे में जाने के। हमें तो याद आता है कि राव सरकार के समय ही बंद हो गयी थी आइ.डी.पी.एल। अशोक बाबू ने कहा।

नहीं बंद तो शायद छियानवें में हुयी है पर बी.आइ.एफ.आर ने इसे बीमार घोषित तो सन बयानवें में ही कर दिया था। विजय बाबू ने कहा।

और बेवकूफियां देखो कैसी कैसी चलती हैं भारत में। सरकारें गाना गाये जाती हैं कि टैक्स पेयर्स का पैसा ऐसे बर्बाद नहीं किया जा सकता हानि में चलने वाली यूनिटों को चलाने में और उधर आइ.डी.पी.एल जैसी यूनिटों के केस चल रहे हैं कोर्ट में। अब सरकार पैसा देती है ऐसे कर्मचारियों को जिन्होने वी.आर.एस नही लिया और जो अभी केस लड़ रहे हैं इस आशा में की कभी तो फैक्टरी दुबारा चलेगी। भले ही सरकार छह छह महीने का पैसा देती है ऐसे कर्मचारियों को पर ये पैसा क्या पेड़ से टपक रहा है? ये पैसा भी टैक्स देने वाले लोगों का ही है। अब जब तक फैक्टरी का निश्चित फैसला नहीं हो जाता तब तक सरकार ऐसे ही पैसा देगी वो भी बिना कुछ काम लिये हुये। एक तो इतना बड़ा क्षेत्र जहाँ फैक्टरी थी आावासीय कालोनी थी स्कूल थे अस्पताल था सब रखरखाव के अभाव में खंडहर हो रहा होगा दूसरे यदि खुदा न खास्ता कभी फैक्टरी को दुबारा चलाना तय हो गया तो सरकार को कितना धन खर्च करना पड़ेगा सब टूटे फूटे को फिर से संवारने में। अगर फैक्टरी चलती रहती तो कम से कम दवाओं का निर्माण तो होता रहता और हो सकता है कि मुक्त बाजार के दौर में ये कम्पनी भी उठ जाती। हरि बाबू ने कहा।

बात तो आप एकदम खरी कह रहे हो। ये जो आई.आई.एम और ऐसे अन्य मैनेजमैंट संस्थानों का इतना हल्ला है और हर साल अखबार छापते रहते हैं कि इस बार यहाँ के स्टूडैन्ट को इतने लाख रूपये का पैकेज मिला और वहाँ के स्टूडैन्ट को उतने लाख का। तो ये क्या पढ़ाते हैं वहाँ। एक भी स्टूडैन्ट ऐसे संस्थानों से नहीं निकलता जो कहे कि मुझे दो ​सिक यूनिट और मैं इसे ढ़ंग से चलाकर दिखाऊंगा। और क्या वहाँ पढ़ाने वाले प्रोफेसर करते हैं जो एक के पास भी समाधान नहीं है बीमार सार्वजनिक उपकरणों की दशा सुधारने का? अशोक बाबू ने शंका प्रकट की।

ये प्रोफेसर इतने उद्यमी होते तो अपने कई उद्योग खड़े कर चुके होते क्लासरूम में लैक्चर न दे रहे होते और सारे संस्थान लाइन लगा देते देश भर में रतन टाटा राहुल बजाज अम्बानी और प्रेमजी जैसों की। ये लोग तो नौकरी कर सकते हैं। जो कम्पनी चल रही है उसी में काम करके पैसा कमा सकते हैं। कुछ विद्धार्थी होते हैं उद्यमी भी, पर उनकी गिनती बहुत कम है। हरि बाबू ने कहा।

अशोक बाबू को बहुत मजेदार लगी बात और वे हँसकर बोले,” सही कह रहे हो आप जो कभी आई.आई.टी न निकाल पाये ऐसे अक्सर कोचिंग देते हैं जे.ई.ई पास करने की”।

विजय बाबू भी हास्य में योगदान देते हुये बोले,” याद नहीं आपको इस लोकसभा चुनाव में दिल्ली से एक मैनेजमैंट गुरू भी लोकसभा चुनाव में खड़ा हुआ था। अब खुद ही हार गया। पता नहीं जमानत भी बची थी या नहीं। स्लोगन बड़ा अच्छा है उसका- विनर्स डोन्ट डू डिफरेन्ट थिंग्स दे डू थिंग्स डिफरेन्टली। अब दिल्ली में कितने लोगों ने उसकी किताब पढ़ी होगी? मैनेजमैंट के स्टूडैन्टस ही वोट दे सकते हैं”।

अशोक बाबू भी हँसते हुये बोले,” हाँ जी पर उपदेश कुशल बहुतेरे”। लो जी सुनील जी भी आ गये आओ सुनील जी पहले तो आप बधाई स्वीकार करो बेटे के प्रमोशन की। हमें तो विजय बाबू से पता चला।

…जारी…

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