अमर गान कैसे हो?

सागर किनारे पहुंचा मैं!

लहरें गा रही थी
अथाह गहराई में बैठा
गुनगुना रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।

चमन की राह से गुज़रा मैं!

फूलों का दिल बन कर
खुशबूओं में फैला रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।

आकाश को तकने लगा मैं !

तारों की महफ़िल में
चांदनी को सुना रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।

वही अमर गीत!
रुमी-तुलसी की ज़बान में है
कबीर-नानक के बयान में है
सूर–मीरा के भक्तिभाव में डूबा
राधा-किशन के बखान में है।
मासूमियत का अहसास बन कर
बच्चे की कोमल मुस्कान में है
प्रीत की कसोटी बनकर
लैला-मजनू की दास्तान में है
इश्क की बुलंदिया छूता हुआ
खुसरो ओ रसखान में है
ग़ालिब–निराला की भाषा बन कर
कविता की आन-बान में है
मंजिलों का पता देता
पक्षियों की उड़ान में है।

खय्याम से मस्ती में गवा रहा है कोई!
प्यारे, तू किराए के मकान में है।

जिस्म में रूह फूंकने वाले ने
मेरे शब्दों को शान नहीं बख्शी
कवि का दिल दे तो दिया
कलम को जान नहीं बख्शी

वह अमर गीत कैसे गाता मैं?

(रफत आलम)

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