मकबूल फिदा हुसैन : पंढ़रपुर के लड़के की धरती से अंतिम उड़ान


कतर की नागरिकता लेकर पासपोर्ट के आधार पर विदेशी बन चुके भारतीय चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन ने धरा से अंतिम विदाई ले ली। अपनी उम्र के लोगों में सबसे सक्रिय कलाकार अब देह में नहीं है। अब उनकी कला और उनके कृत्य ही पीछे रह गये हैं। अपने जीवनकाल में भी वे भरपूर सामग्री छोड़ते रहे जिससे लोग उनकी चर्चा करते रहें और आगे भी ऐसा ही होगा। उन्हे पसंद कीजिये, नापसंदगी की बौछारें उनके ऊपर कीजिये उन्हे नज़र अंदाज़ कर पाना मुमकिन नहीं था।

अब उनसे गिले-शिकवे रखने का कोई औचित्य नहीं रहा। भारत में जन्मे इस चित्रकार ने दुनिया भर में अपनी कला के बलबूते नाम कमाया। वे एक ज़हीन चित्रकार थे यह तो एक स्थापित सी बात है। वे फिल्मकार भी थे और साठ के दशक से शुरुआत करके (जब उन्होने एक डॉक्यूमेंटरी बनायी थी) उन्होने गजगामिनी और मीनाक्षी- ए टेल ऑफ थ्री सिटीज़, दो फिल्में बनायीं और तीसरी फिल्म वे लगभग पूरी कर चुके थे।

उन्होने पंढ़रपुर का लड़का नामक आत्मकथा भी लिखी।

उनके पास कविता रचने की कला भी थी। बानगी देख लें।

मुझे बर्फ से लिपटा आकाश भेजना
जिस पर कोई धब्बा न हो
मैं सफेद शब्दों से उस पर उभारों से भरे चित्र बनाऊँगा
तुम्हारी असीम पीड़ा के
जिस समय मैं चित्र बनाऊँ
तुम आकाश को
हाथों में थामे रखना
क्योंकि अपने कैनवास का तनाव
मेरे लिये अपरिचित है।

उनकी कविता में ही उनकी चित्रकारी शब्द नहीं उकेरती है बल्कि उनकी दोनों फिल्में भी पुकार पुकार कर बताती हैं कि इन्हे बनाने वाले निर्देशक के पास एक बहुत बड़े चित्रकार की दृष्टि है।

शांति का बहुत गहरा नाता उनके साथ रहा नहीं पर रचतात्मकता का भंडार उनके पास अवश्य रहा है अतः यही प्राथना की जा सकती है –

ईश्वर उनकी आत्मा की रचनात्मकता को बनाये रखे!

अगर वे भारत में ही दफनाये होने की इच्छा रखते थे तो आशा है तमाम विवादों को दरकिनार करके भारत उनके लिये ऐसा इंतजाम कर देगा।

यहीं की मिट्टी में वे जन्मे थे और यहीं उन्हे सुपुर्द-ए-खाक किया जाना चाहिये।

4 टिप्पणियाँ to “मकबूल फिदा हुसैन : पंढ़रपुर के लड़के की धरती से अंतिम उड़ान”

  1. मुझे बर्फ से लिपटा आकाश भेजना
    जिस पर कोई धब्बा न हो…….zami kha gyi aasma kese kese.
    आह्..हुसेन साहिब नहीं रहे …दो गज ज़मी न भी न मिली कूए यार में ,अब मुट्ठी भर ख़ाक का क्या जी चाहे जहाँ दफनाओं.हज़रत हुसेन तो अमर हैं. हाँ ,उनके विरोधियों का कल कोई नामलेवा भी न होगा.खुदा ताला उनको मगफिरत बक्शे .ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे .

  2. हुसैन साहब को श्रद्धांजलि! वे जहीन इंसान थे। बेमिसाल चित्रकार भी। जहीन इंसानों को अपने संकीर्णों की नासमझी झेलनी पड़ती है, उन्हें भी झेलनी पड़ी। गनीमत है कि वे कम से कम गांधी की तरह मारे नहीं गए।

  3. मान लें ‘सबै भूमि गोपाल की’
    चित्र क्‍या उनका सेल्‍फ पोर्टेट जैसी कोई चीज है.

  4. तुम्हारी असीम पीड़ा के
    जिस समय मैं चित्र बनाऊँ
    तुम आकाश को
    हाथों में थामे रखना….

    उन्हे पसंद कीजिये, नापसंदगी की बौछारें उनके ऊपर कीजिये उन्हे नज़र अंदाज़ कर पाना मुमकिन नहीं था…सही…

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