सुंदरता अभिशाप बना दी जाती है!

पँखों का महत्व
पिंजरे में कैद पंछी के लिए
अर्थहीन है,
उसकी घायल चोँच
आज़ादी का सपना लिए
लोहे के तारों से लड़ रही है।

दो पल बहलने का सामान है
पँखों के रुपहले रंग,
लहू टपकाती चोँचों का क्रंदन
मनमोहक लगता है
संवेदनहीन अहसास को।

सुंदरता सदा से अभिशाप है!

वरना क्यों हरम भरे जाते
कहाँ रनवासों में मुरझाते
बेमिसाल हुस्न?
अपने पौरुष का दंभ भरने वाले भूपति
नपुंसकों की टोलियों से
अश्गाहों की रखवाली क्यों करवाते?

आह!
किस तरह लुटे होंगे
मासूम अरमान!

आज भी रईसों की जामत
कमसिन सोंदर्य की
वही बाइज्ज़त खरीदार है,
कला का नाम देकर
नग्नता का नाच देख रही हैं
अय्याशों की मदमस्त आँखें।

ये उन्मुक्तता यदि प्रगति का पैमाना है
क्यों आत्महत्या कर लेती है
सफलतम मॉडल?

(रफत आलम)

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7 टिप्पणियाँ to “सुंदरता अभिशाप बना दी जाती है!”

  1. सुंदरता सदा से अभिशाप है!

    आई ऑब्जैक्ट योर ऑनर.

    भले ही आपने इसे किसी सन्दर्भ में लिखा है, मगर यह है गलत.

  2. बहुत अच्छी कविता है रफत जी

  3. रवि जी,
    Narcissus के संदर्भ में तो यह सच ही लगता है। रानी पदमिनी के संदर्भ में भी सच लगता है और आजकल के दौर में दिवंगत प्रियदर्शनी मट्टू जैसे पीड़ितों के संदर्भ में भी सच लगने लगता है। जब तक अलाऊद्दीन खिलजी और मिस मटटू के बलात्कारी हत्यारे जैसे लोग हैं तब तक कम से कम नारी सौन्दर्य तो खतरे में पड़ता ही रहता है। ऐसे किस्से घटते रहे हैं जहाँ किसी बेहद खूबसूरत नारी को देवदासी सरीखा बना दिया शक्क्तिशाली पुरुषों ने। ऐसी नारियाँ इतनी खूबसूरत न होतीं तो शायद उन्हे ऐसे हाल से न गुजरना पड़ता।
    आदर्श रुप में सच न लगे और कड़वा लग सकता है ऐसा कहना पर वास्तविकता को देखते हुये तो कभी कभी किसी किसी संदर्भ में ऐसा सच होता दिखायी देने लगता है।

  4. श्रीमान राहुल सिंह साहिब धन्यवाद

  5. श्रीमान रवि जी आपकी टिप्पणी सर आखों पर .सीधी सी बात है हर सिक्के के दो पहलु होते हैं- किसी सुबह गुलाबको खिलता हुआ देखिये और धूप में बैठ कर मुरझाता हुआ भी बशर्ते की उससे पहले वह तोड़ न लिया जाए .शायद संदर्ब तक आप पहुँच जाएँ .बहुत आभार

  6. श्रीमान राकेश साहिब विचार तो अखबार में एक मॉडल द्वारा आत्महत्या से जन्मा था जिसने कई चैनल जिनमें वो बद्निसीब मट्टु / जेसिका /उमराव भी थीं और वक्त बेवक्त खुद का ओबसरवेसन जिस ने ये कविता का टुटा फूटा आकार लिया .दरअसल पासग भी नहीं जो मैं लिखना चाहता था हुस्न और उसके भोगे पर .किसी ने कहा है
    ये गीत जो गाये हैं सो तो मेरे हैं
    जो गा न सका वो हसीनतर होंगे .
    आपका बहुत शुक्रिया को बात को गहराई तक लेके गए .

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