कुचली स्मृतियाँ

मेरे दोस्त कहते हैं –
यह एक कुहासा है
हर ज़िंदगी में आता है
तुम्हे निराश नहीं होना चाहिये
दूसरा बीज बोना चाहिये।

मगर मैं जानता हूँ
कि जो फसल मैंने
तुम्हारी हथेली पर उगायी थी
उसमें अपनी समूची ज़िंदगी लगायी थी
अब मैं अपनी वह ज़िंदगी
कहाँ से लाऊँ,
वैसी ही दूसरी फसल
कैसे उगाऊँ?

और इसका भी क्या भरोसा
कि तुम
उतनी ही उर्वरा होगी।

यदि ऐसा नहीं होता
या सब कुछ पहले जैसा होता
तो फिर मैं एक बार
साधिकार
तुम्हारी नरम हथेलियों को पढ़ता
उनके साथ जीता
मरता।

या फिर
किन्ही दूसरी हथेलियों की ओर बढ़ता
एक नया प्रयोग जरुर करता।

क्योंकि हारना या हार मान लेना
समूची ज़िंदगी गवाँ बैठने से
कुछ ज्यादा ही गवाँ बैठना है।

मेरे इस सवाल का जवाब कि
आदमी के पास आखिर
ज़िंदगी से भी ज्यादा कीमती क्या है?
कि जिसके खो जाने की आशंका मात्र से ही
एक अज्ञान भय भर जाता है
और आदमी जीते जी मर जाता है।

तुम बता नहीं सकते
तुम्हारे भीतर ज़िंदगी ही नहीं
जीते रहने का एहसास भी मर चुका है
तुम्हारी स्मृतियों पर
भारी-भरकम
रोड रोलर गुजर चुका है।

{कृष्ण बिहारी}

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One Comment to “कुचली स्मृतियाँ”

  1. आदमी के पास आखिर ज़िंदगी से भी ज्यादा कीमती क्या है?

    स्मृतियों का एकतरफा कुचला जाना कठिनाई दूर नहीं कर पाता। दोनों ही पक्ष स्मृतियों को संजोकर आगे बढ़ जायें तो भला समाधान निकल भी आता है।

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