बूँद में समंदर

सौ परिक्षाओं से गुजरोगे हर जीत हार में
प्रयास करना के रहो सदा अव्वल कतार में

उजाले नज़र आये भिखारियों की कतार में
सुना था रौशनी बंटेगी अंधों के दरबार में

गुमराही के सिवा अपने को मिलना है क्या
रहनुमाँ सच्चे हैं ना आचार में ना विचार में

ध्यान से देखो तो इसमें समंदर हैं समाये
ये बूँद जो नन्ही नज़र आ रही है आकार में

हर रास्ते सौदा हो रहा है काली कमाई का
खुले बिका करता है ज़मीर आज बाज़ार में

मंजिलों के सफर चल दिए कारवाँ के साथ
अपना नसीब देखिये हम खो गए गुबार में

नफरत की क्या कहें घाव प्रीत के थे गहरे
दिखे तक भी नहीं और मार गए प्यार में

फूलों से तो ज़ख्मों के सिवा कुछ ना मिला
काँटों का खलूस आजमाएंगे अबके बहार में

अपनों ने वो चोट दी के दुश्मन लगे शर्माने
बहुत फरेब खाए हैं आलम हमने एतबार में

(रफत आलम)

4 टिप्पणियाँ to “बूँद में समंदर”

  1. ध्यान से देखो तो इसमें समंदर हैं समाये
    ये बूँद जो नन्ही नज़र आ रही है आकार में…

    बढ़िया ग़ज़ल…

  2. जनाब रवि कुमार साहिब बहुत धन्यवाद होस्लाफ्जाही के लिए .

  3. har baat solah aane sach …badi khoosooratee se bayaan kiya hai Rafat Saheb ..badhaaee

  4. मोहतरमा शारदा साहिबा ,ज़र्रानवाजी आपकी .मैं शुक्रगुजार हूँ .

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