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मई 20, 2011

जो कर न सकूँ

मिल ना पाऊँ और उसको भुला भी ना सकूँ
वो छुपा है मुझ ही में जिसे पा भी ना सकूँ

एक घाव है जिसे दिल से भुला भी ना सकूँ
और चोट दी है किसने ये बता भी ना सकूँ

खून दिल का नज़र आता है कहाँ दामन पर
ज़ख्म अपनों ने दिए हैं जो बता भी ना सकूँ

खो गए ख़्वाबों की किसी राह से पुकार मुझे
इतना दूर तो नहीं तुझसे के आ भी ना सकूँ

बह गए हैं ना चाहते हुए भी आँखों से आंसू
ऐसा बोझ तूने दिया है जो उठा भी ना सकूँ

सितारों की महफ़िल में रोज तलाशता हूँ उसे
इतना दूर चला गया वो के बुला भी ना सकूँ

तका करता हूँ बेबसी से रोज आकाश को मैं
ऐसा रूठ कर गया कोई के मना भी ना सकूँ

मैं तड़पता रहूं तड़प कर तुझी को याद करूँ
इतना गम मुझे ना दे जो छुपा भी ना सकूँ

तू उन्ही कातिल अदाओं से आजमा तो सही
ऐसा कब हूँ मैं के फिर फरेब खा भी ना सकूँ

फल लदे पेड़ों से मैंने झुकने की ली है सीख
खड़ा बांस नहीं के खुद को झुका भी ना सकूँ

मेरा ज़र्फ झुकने से टूटना समझता है बेहतर
सर तो दे आऊं, सर कहीं  झुका भी ना सकूँ

बह  गए हैं ना चाहते हुए भी आँखों से आंसू
ऐसा बोझ तूने दिया है जो उठा भी ना सकूँ

चंद कागजों पर लव्ज़ आसुंओं में बिखरे हुए
क्या खजाने हैं ये खत जो जला भी ना सकूँ

खामोशी की सदाओं में जो जन्मते हैं आलम
सुना भी ना सकूं, वो नगमे गा भी ना सकूँ

(हज़रत मिर्जा ग़ालिब और हज़रत अमीर मिनाई के क़दमों की धूल को नज़र)

(रफत आलम)

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