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मई 15, 2011

साइकिल वाले खान साहब

खान साब सहायक से उप-सचिव पद पर सचिवालय के मलाईदार खान विभाग में पदोन्नत हुए तो सभी पड़ोसियों को एक जिज्ञासा होनी लाज़िमी थी कि सदा से साइकिल पर चलने वाले और मोबाइल जैसी सुविधाओं से परहेज़ करने वाले खान साब क्या अब अपनी सादा जीवन शैली में परिवर्तन करेंगे, या पहले जैसे सीधे सरल और ईमानदार बने रहेंगे?

खान साब की पत्नी अलबत्ता दुनियादार महिला थीं। इस चमचमाहट के दौर में खान साब जैसा सादा-सरल पति पाकर कुंठा से ग्रसित रहती थीं। घर में ऐशो-आराम की आधुनिक सुविधाए नहीं होने का उन्हें बड़ा मलाल था और इसका सारा दोष वे अपने पति की ईमानदारी को दिया करती थीं।

खान साब की पदोन्नति के बाद जल्दी ही उनकी पत्नी ने आस-पड़ोस की महिलाओं को अपने पति से जुडा एक रोचक किस्सा सुना भी दिया।

“कल तो इनके साथ अच्छा हुआ। ये तो आदत के मुताबिक छुट्टी होते ही ऑफिस से ६ बजे निकल आये। सैक्रेटरी साब ने तलब कर लिया। जनाब न तो घर में फोन लगाते हैं न मोबाइल रखते है सो खूब झाड पड़ी”।

पदोन्नति के एक महीने के अंदर ही खान साब ने अचानक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली तो सब पडोसियों और इस बार तो उनकी पत्नी तक का चौंकना वाजिब था।

उनकी पत्नी ने बताया कि आज तो खान साब नौकरी भी छोड़ आये। सवेरे देर तक बिस्तर में पड़े रहे थे।

कहने लगीं,” मैंने पूछा, जी आज ऑफिस नहीं जाओगे, तो फरमाने लगे, बेगम! हमने इस्तीफा दे दिया है”।

“जैसे नौकरी भी अखबार हो, पढ़ा तो पढ़ा नहीं तो उलट के पटक दिया। ऊपर से ज़रा भी अफ़सोस नहीं। जनाब आराम से अखबार पढ़ रहे थे। मैंने भी ऐसी क्लास ली कि खाना भी नहीं खाया देर तक। जी तो चाहा भूखा ही मरने दूं। पर क्या करूँ बहिन! मन मार कर रोटी खिलानी पड़ी। खूंटे बंधे जानवर को भी भूखा नहीं रखा जाता। फिर ये तो जैसे हैं वैसे ही हैं। क्या किया जाए”?

“किस्मत ही फूटी है जो इन जैसे करमनिखट्टू के पल्ले बंधी। घर में दो बेरोजगार बेटे छाती पर मूंग दल रहे हैं। अरे! नौकरी में रहते बेटी के हाथ ही पीले कर देते। शासन सचिव के रुतबे में ढंग का लड़का तो मिल जाता। ज़रा भी नहीं सोचा बुद्धू जी ने”। वे सर पकड़ कर बैठ गयीं।

खान साब चूँकि आपने आप तक ही सीमित रहते थे, इसलिए इस्तीफे देने के कारण का तसल्लीबख्श जवाब मिलना असंभव सा लगता था। फिर भी एक शाम बतौर संवेदना उनके घर जाकर बातों के दौरान झिझकते हुये पूछ ही लिया,” भाई साहब! ऐसा क्या हुआ कि आपने अचानक इस्तीफा दे दिया”?

जनाब, सवाल उछालने भर की देर थी कि जैसे बरसों से कैद किसी तड़क गयी चट्टान से लावा फूट पडा हो।

“यार! सब साले बेईमान हैं, कब तक सहन करता? देखो प्रमोशन दे के क्या अहसान किया, कुँए से खाई में पटक दिया। खान विभाग तो भाई डाकुओं का अड्डा निकला”।

तीसरे दिन ही सचिव साब ने तलब किया और कहने लगे,” खान! ये फलां फलां फाइलें है इनमें मंत्री महोदय का इनट्रेस्ट् है, ज़रा देख लेना”।

आगे की बेहयाई तो देखो, खुद मेरा असिस्टेंट फाइल के साथ रिश्वत लेकर हाज़िर। पहले तो दुनिया भर की बातें करता रहा फिर बेशर्म हंसी के साथ कहने लगा,” हें ..हें ..हें साब ये लिफाफा आपके प्रमोशन पर, बतौर गिफ्ट फलां साहब ने भिजवाया है. सर! एक लाख रूपये हैं”।

फिर साले ने उसी गंदी बनावटी हंसी के साथ सलाह भी दे डाली,” हें…हें …हें वैसे भी तो अपने को फ़ाइल निकालनी है ना साब, सो कुछ हाथ पल्ले आ रहा है तो बुरा क्या है?”

खान साब बिफ़र रहे थे,” यार! क्या ऐसा भी वक्त देखना लिखा था। जी तो चाहा हरामखोर की गर्दन मरोड़ दूं पर फटकार लगाने के सिवा क्या कर सकता था”।

चलो यार! यहाँ तक भी सब्र था लेकिन रोज सचिव के उलहानों और मंत्री के पी.ए. का फोन पर बार-बार तकाजा, खोपड़ी ही आऊट हो रही थी। बताओ, कैसे सिफारिश कर देता करोडों की खानें लाखों में अलॉट करने की। भाई! साली, हद तो तब हो गई जब लंच में खुद पार्टी हाज़िर मेरे उसी नालायक असिस्टेंट के साथ। साला! पच्चीस लाख ब्रीफकेस में लाकर सीधी रिश्वत देना चाह रहा था। पहले तो राज़ी-राज़ी समझा कर रवाना करना चाहता था। मोटी चमड़ी वाले नहीं माने तो आखिर एंटीकरप्शन विभाग बुलाने की धमकी देकर कमरे से निकाला।

बेईमानों का हौसला तो देखो उलटे मुझी को तड़ी दे गए कि मैं क्या एंटीकरप्शन विभाग बुलवाऊँगा वे लोग ही कुछ दिन में मुझे सीखचों के पीछे भिजवा देंगें।

भाई! मैं सकते में आ गया था सब लोगों की मिलीभगत देखकर। एक काल्पनिक परन्तु आज के कुँए में भाँग पड़ी वाले बेईमान दौर में, कभी भी सच हो सकने वाला मंज़र, जिसमें मैं जेल में बैठा हूँ, आँखों के सामने लहरा गया था। क्या बताऊँ उस वक्त की कैफियत।

रोज़ मर्रा के हिसाब से मुझे परेशान करने लगे। मैं सोचता रहता कि क्या करूँ? आखिर अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर उन फाइलों पर जो वाजिब टिप्पणियाँ होनी चाहिए थीं दर्ज कर दीं। फिर कागज़ उठाया और इस्तीफा लिख, दस्तखत कर सैक्रेटरी महोदय को पेश कर आया। ज़िंदगी ने दुःख तो कई और भी दिए हैं पर सबसे बड़ा अफ़सोस यही है कि किसी ने नहीं टोका मुझे। दफ्तर में कोई नहीं बोला कि पकी-पकाई नौकरी क्यों छोड़ रहा हूँ?

बोलते-बोलते खान साब की आवेश पूर्ण आवाज़ स्वतः ही धीमी होती चली गयी थी। अचानक लंबी साँस लेकर वे चुप हो गए। गीली हो गयी थीं उनकी आँखे।

अक्सर शहर के रास्तों पर चौपहिया वाहनों और मोटर साइकिलों के रेल-पेल में खान साब दिखायी दे जाते हैं अपनी साइकिल पर सवार। ऐसा लगता है उन्हे देख कि आज भी उनकी आँखें गीली हैं।

(रफत आलम)

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जिंदगी से बड़ी सजा  ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं
इतने हिस्सों में बंट गया हूँ मैं
अपने हिस्से में कुछ बचा ही नहीं
जिंदगी मौत  तेरी  मंजिल है
दूसरा  कोई  रास्ता  ही  नहीं
सच घटे या बढे तो सच न रहे
झूठ की कोई इन्तेहा ही  नहीं
जड़ दो चांदी में चाहे सोने में
आइना  झूठ  बोलता ही  नहीं  (कृष्ण बिहारी नूर)

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