Archive for अप्रैल 30th, 2011

अप्रैल 30, 2011

सपने डूबते हैं ज़हर में

नज़रें थक गयी नज़ारे इतने समाये नजर में
सब कुछ देखा आदमी के सिवा इस शहर में

ये बात अलग है उसका पता मिला या नहीं
किसी ने हवा में ढूँढा उसे किसी ने पत्थर में

हुई रात तो बच्चे अपने दड़बों में दुबक गए
पुरानी कुछ दीवारें जाग रही हैं अकेले घर में

मुँह दिखाई के रिश्ते दिल की राहें भूल गए
अजनबी अपने कमरे हैं आज सब के घर में

अँधेरा रात के संग मैली राहों पर जा भटका
चांदनी करवटें बदलती रही जलते बिस्तर में

धुंधले हुए नजारों के रंग तेरे बिना ए दोस्त
मंज़र कोई ठहरता ही नहीं अब इस नज़र में

जलती धूप में चलते रहना है जाने कब तक
पाँवों के कांटे क्या गिनें अभी तो हैं सफर में

जिंदगी बेअर्थ हुई क्या संवेदनहीन माहौल में
वरना क्यों कोमल सपने डूब रहे हैं ज़हर में

दिन की चाकरी के बाद भी चैन कहाँ आलम  
वही खड़कते बर्तन मिलगे जब लौटूँगा घर में

(रफत आलम)

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