Archive for अप्रैल 27th, 2011

अप्रैल 27, 2011

पत्थर नहीं हीरा बन

जिंदगी की ठोकरों से
घबरा कर
पत्थर न बन यार!

तेरे भीतर छिपा है हीरा
तलाश उसे
तराश उसे।

माना बहुत लंबा है
सडक पर लुढ़कते फिरने से
मुकुट की शोभा बनने तक का सफर।

बुद्धि और बदन को कठोर कर
हाथ की लकीरों को रोने वाले
उठा हाथ में
कलम हो के कुदाल
पसीने की नदी में बहकर ही
सफलता के सागर की मिलती है थाह।

याद रखना
बिना तपे
सोना निखरता कब है
भीतरी आग अगर नहीं होती
सूरज रात बना रहता।

कटने-छटने-सँवरने की पीड़ा में ही
छिपा है
पत्थर से हीरा बनने का राज़
जिसकी  कुंजी
तेरी पहुँच से दूर नहीं!

(रफत आलम)

Advertisements
अप्रैल 27, 2011

एक रचना: पहला प्रसंग

प्राय: सोचता हूँ
दिल के भीतर कैद
यादों की वह कालकोठरी खोलूँ
जिसमें एक निर्दोष आत्मा
जाने कब से अनियत कालीन
दण्ड भुगत रही है।

खुद को
अपने भीतर बंदी रखना
कितनी बड़ी सजा है!

यही समय है
मुक्त्त कर दूँ उसे
या फिर निर्वासन ही दे दूँ
हमेशा-हमेशा के लिये,
सही
एक यही प्रायश्चित होगा।

जैसी करनी वैसी भरनी…
कैसा अतीत…
क्या इतना मुश्किल है
बिना विगत के जीना?
जी लूँगा…
एक और विष पी लूँगा।

उसे मुक्त्त करना ही होगा
पता नहीं – कोठरी छोटी हो गई है या कि
यादों का आकार बड़ा
दोनों ही एक दूसरे के लिये नाकाफी हैं।

सब कुछ धुंधुला-धुँधला सा है।
सचमुच मैं इतना उदार कब था
उसे दुख देना ही तो
मेरा सुख था।

यह कैसी बैचेनी है
जिस पर कोई लगाम नहीं है
जिसकी गति हलचल
और अस्थिरता पर कोई
विराम नहीं है।

कुछ करना ही होगा अब तो
इससे निजात पाने को
वह प्यास बुझाने को
जो एक नदी पीकर भी शांत नहीं होगी।

फिर भी
प्यास बुझाने की कोशिश
अपराध नहीं है।

लो हो गया निर्णय!

मुक्त्त करुँगा कैदी को कारा से!

{कृष्ण बिहारी}

एक रचना : दूसरा प्रसंग

एक रचना : तीसरा प्रसंग
एक रचना: निर्णायक प्रसंग

%d bloggers like this: