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अप्रैल 24, 2011

दर्द की दवा

गज़ल…रफत आलम

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किसी से उम्मीद है फ़िज़ूल आज कोई क्या देगा
दिल की दौलत छुपा लेगा खाली हाथ दिखा देगा

हमारी भूख को राशनकार्ड थमा कर हाकिमे शहर
जलती प्यास पर टूटे मटकों की मुहर लगा देगा

अभी तो कीचड ने लगाए हैं दामन पर चंद धब्बे
गंद के शिकवे की सज़ा देखिए दौर हमें क्या देगा

कलम की जगह झूठे बरतन नन्हे हाथों में देकर
वक्त गरीब बच्चों को जिंदगी के ढंग सिखा देगा

कौन सा खज़ाना है आँसू जिसे छुपाये फिरते हो
ये दरिया अगर बह निकला तो तुमको डूबा देगा

सोचता हूँ देने वाला आखिर दर्द देता ही क्यों है
ये मान लिया जिसने दर्द दिया है वही दवा देगा

दुनिया क्या याद रहती अपना पता भी भूल गए
हमें मालूम नहीं था तेरा गम इस कदर नशा देगा

एक छोटी सी विज्ञापनी खबर पल में बन जाओगे
आलम  माटी का हर रिश्ता कल तुमको भुला देगा

(रफत आलम)

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