हॉफ टिकट

चाणक्यपुरी में खड़े खड़े बहुत देर तक उसे ऑटो नहीं मिला तो मोहन, शिवाजी स्टेडियम जाने वाली बस में बैठ गया। विदेशी दूतावास वालों ने उसका दिमाग मथ कर रख दिया था। अगर कम्पनी के काम से विदेश जाना न होता तो वह दूतावास की इमारत में दुबारा कदम भी न रखता पर उसे एक बार और आना पड़ेगा। दूतावास के कर्मचारियों का व्यवहार बेहद घटिया था। अपना नम्बर आने के इंतजार में बैठे हुये वह सोचता रहा था कि विदेशी दूतावास में काम करने वाले कर्मचारी ऐसा क्यों सोचते हैं कि भारत से बाहर जाने वाले सभी अपराधी ही हैं और गलत कागजों के सहारे ही बाहर जा रहे होंगे? विदेशी कर्मचारी तो एकतरफ, इन विदेशी दूतावासों में काम करने वाले भारतीय कर्मचारी भी बेहद कर्कश पाये जाते हैं और वे घटिया तरीके से भारतीयों के साथ व्यवहार करते हैं।

बस में चढ़ते ही उसने शिवाजी स्टेडियम के लिये टिकट ले लिया। उसने सौ का नोट कंडक्टर को दिया तो उसने उसे बाकी पैसे कुछ देर में देने के लिये कहा और बस के कनॉट प्लेस के क्षेत्र में घुसने से पहले ही पैसे दे भी दिये। बस में भीड़ थी और सारी यात्रा खड़े हुये ही करनी पड़ी थी। रास्ते भर लोग चढ़ते उतरते रहे और इस आवागमन के कारण वह बस के दरवाजे से बस के मध्य में पहुँच गया।

बस शिवाजी स्टेडियम जाकर रुकी तो कंडक्टर ने लोगों को नीचे उतारने की जल्दी मचा दी जबकि लोग खुद ही उतरने के लिये रेलेपेल मचाये हुये थे। कंडक्टर आगे के दरवाजे से लोगों को उतरने का निर्देश बार बार दे रहा था और पीछे के दरवाजे पर खड़े अपने सहायक को चिल्ला चिल्ला कर निर्देशित कर रहा था नयी सवारियों को वहाँ से बस में चढ़ाने के लिये।

मोहन भी उतरने लगा और बस की सीढ़ियाँ उतरते हुये उसने टिकट फाड़ा और उसका आधा हिस्सा जमीन पर गिर कर हवा के साथ उड़ गया और नीचे का आधा हिस्सा उसके हाथ में रह गया। उसने जमीन पर पैर रखे ही थे कि एक प्रौढ़ व्यक्ति ने उससे कहा,” टिकट दिखाइये”।

मोहन ने अब उस व्यक्ति पर ध्यान दिया। पुलिस के एक सिपाही के साथ खड़ा प्रौढ़ उससे टिकट माँग रहा था। शर्तिया प्रौढ़ ने उसे उतरते हुये टिकट फाड़ते हुये देखा होगा।

मोहन ने उसे टिकट का आधा हिस्सा दे दिया। प्रौढ़ ने टिकट अपने हाथ में लिया और उसे देखा और कहा कि यह वेलिड टिकट नहीं है। कंडक्टर भी मोहन के साथ नीचे उतर आया था।

प्रौढ़ ने मोहन से कहा,”इधर साइड में खड़े हो जाओ”। मोहन के बाद 5-6 लोग और उतरे। एक आदमी ने अपना टिकट एकदम मसला हुआ था। प्रौढ़ ने उसका टिकट उसके हाथ में दूर से ही देखा और उसे जाने दिया।

मोहन ने प्रौढ़ से पूछा,” टिकट वेलिड क्यों नहीं है, अभी आपके सामने इस बस से मैं उतरा हूँ, रास्ते में टिकट खरीदा है”?

प्रौढ़ ने कहा,” हमें कैसे पता चलेगा आधे टिकट से कि यह अभी का है और यात्रा के पूरे पैसे दिये गये हैं या सही टिकट लिया गया है”।

सही टिकट? आप कंडक्टर से पूछिये, मैं चाणक्यपुरी से चढ़ा, इनसे शिवाजी स्टेडियम का टिकट माँगा और इन्होने जो टिकट दिया और जितने पैसे माँगे मैंने दिये और टिकट लिया”।

पास खड़े कंडक्टर ने स्वीकृति में सिर हिलाया। प्रौढ़ ने कंडक्टर की ओर देखा भी नहीं और उसे वहाँ से हटने के लिये हाथ से इशारा किया और मोहन से कहा,” हमें इस बात से मतलब नहीं, हमें तो यहाँ पूरा और वेलिड टिकट चाहिये”।

बस पुनः सवारियों से भर चुकी थी और ड्राइवर ने तेज आवाज में हॉर्न बजाया और कंडक्टर को आवाज लगायी चलने के लिये।

कंडक्टर, सरकारी अधिकारी और मोहन को देखते हुये पिछले दरवाजे से बस में चढ़ गया और उसने सीटी मारकर ड्राइवर को चलने का संदेश दिया। बस चल दी।

मोहन को कुछ आभास हो गया कि प्रौढ़ अधिकारी उसे फँसा रहा है। कंडक्टर ही उसका गवाह था और वह चला गया था।

देखिये मैं आपको बता चुका हूँ कि मैंने चाणक्यपुरी से टिकट लिया और पूरे पैसे कंडक्टर को दिये। उसे आपने रोका नहीं वरना वह आपको सच बता देता।

हमें सुनना ही नहीं कंडक्टर से कुछ भी। हमें वेलिड टिकट दिखा दो।

टिकट तो आपको दिया अभी। बस से उतरते समय आधा फाड़ दिया था। बस में बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था कि यात्रा के पूरा होने पर टिकट को नष्ट कर दें जिससे उसका दुरुपयोग न होने पाये।

हमें बस के अंदर से मतलब ही नहीं। हमें तो यहाँ की गयी यात्रा के लिये वेलिड टिकट चाहिये।

अब मैं टिकट का दूसरा हिस्सा कहाँ से खोजूँगा।

आपने बिना टिकट यात्रा की है।

बताया तो आपको कि चाणक्यपुरी से टिकट लिया था।

हमें क्या पता कि आप चाणक्यपुरी से ही चढ़े थे? क्या पता आप किसी पहले के स्टॉप से चढ़े हो? हौज़ खास से आये हो? अपनी यात्रा की वैधता के लिये वेलिड टिकट दो।

कंडक्टर को तो आपने भगा दिया। वही तो बता सकता था कि मैं चाणक्यपुरी से ही चढ़ा और वहीं से टिकट लिया। वैसे मुझे ऐसा लग रहा है कि अगर मेरे पास पूरा टिकट भी होता तब भी आप यह बात कहते कि आपको कैसे पता कि मैं कहाँ से चढ़ा था और क्या वाकई मैंने सही टिकट लिया था?

“आपने बिना टिकट यात्रा की है”। नाक पर नीचे खिसक आये चश्मे को ऊपर खिसकाते हुये प्रौढ़ ने दोहराया।

ऐसे कैसे बिना टिकट के यात्रा की है।

आप पर बिना टिकट यात्रा करने का केस हो सकता है।

प्रौढ़ ने सिपाही की ओर देखा।

सिपाही मोहन के पास आ गया और फुसफुसाते हुये कहा,” सौ रुपये देकर रफा दफा करो मामला”।

मुझे ऐसा लग रहा है आप मुझे जानकर फंसा रहे हैं।

प्रौढ़ अपनी जेब टटोलने लगा और जेब से पान निकालकर उसने खा लिया।

सिपाही ने फिर मोहन से धीरे से कहा,” मामला न बढ़ाओ, चुपके से सौ रुपये दो और खिसको”।

मोहन ने सिपाही की बात पर ध्यान नहीं दिया और प्रौढ़ से कहा,” वहाँ नियंत्रण कक्ष में चलिये, उस बस का नम्बर पता चल जायेगा। मैं तैयार हूँ वापिस उसी बस के यहाँ तक आने के लिये। कंडक्टर बता देगा सही बात”।

प्रौढ़ ने मुँह बिचका कर कहा,” हम यहाँ सारा दिन तो बैठे नहीं रहेंगे।”

मैंने देखा कि एक कुचले मसले हुये टिकट पर आपने कोई आपत्ति नहीं की और यात्री को जाने दिया।

हमारे विवेक के ऊपर है। हमें लगा उसका टिकट सही था। आपका नहीं हैं।

एक बस चलने को तैयार थी। प्रौढ़ उसमें सवार होने लगा और सिपाही से उसने मोहन को साथ लेने के लिये कहा।

सिपाही मोहन को लेकर बस में चढ़ गया।

मोहन ने पूछा,” कहाँ ले जा रहे हैं मुझे”।

हेड आफिस जायेंगे वहीं मामला सुलटेगा।

सिपाही ने मोहन को घूर कर कहा,” अरे साहब को जुर्माने के सौ रुपये दो और जाओ”।

बस रेंग कर चल पड़ी थी। बस अड्डे से निकल कर सड़क पर रेड लाइट पर आकर खड़ी हो गयी।

मोहन ने प्रौढ़ से कहा,” मुझे जबरदस्ती फंसाया जा रहा है। आपको कोटा पूरा करना होगा। मेरे पास टिकट था। चलो मैं जुर्माना देने को तैयार हूँ। काटो कितना जुर्माना लगेगा।”

प्रौढ़ ने गुस्से से उसे घूरते हुये कहा,” हमारे ऊपर है हम जुर्माना लें न लें। हम तो आपको जेल भेज सकते हैं।”

मोहन को भी गुस्सा आ गया,” चलो आप जेल ही भेजो। मैं भी देखता हूँ क्या क्या कर सकते हो। इतनी अंधेरगर्दी नहीं छायी हुई है देश में कि आप जो चाहे सो कर लो। आप जुर्माना बताओ, मैं तैयार हूँ देने के लिये जबकि मेरी गलती नहीं है”।

प्रौढ़ उसे घूरता रहा और कहा,: दौ सौ पचास रुपये जुर्माना है”।

सिपाही ने मोहन से कहा,” अरे क्यों मामला उलझा रहा है, सौ में काम हो रहा है तेरा, दे के सुलटा ले”।

मोहन ने कहा,” ठीक है आप रसीद काटो, मैं दौ सौ पचास रुपये देता हूँ।”

ग्रीन लाइट होते ही बस चल पड़ी थी।

प्रौढ़ ने अपने बैग से रसीद काटने वाली पुस्तिका निकाली और मोहन से कहा,” निकालो दौ सौ पचास”।

इस बस का कंडक्टर और उसमें बैठी सवारियाँ उसकी ओर ऐसे देख रहीं थीं मानो वह कोई अपराधी हो।

मोहन की ऊपरी जेब में दौ सौ रुपये थे उसने निकाले और पर्स उसने हाथ में पकड़े बैग में रखा हुआ था सो उसे खोलने लगा।

सिपाही ने उसके हाथ से दौ सौ रुपये ले लिये।

सिपाही ने कंडक्टर से बस रुकवाने के लिये कहा।

बस के रुकते ही सिपाही ने मोहन को बस से नीचे धकेलते हुये कहा,”चल सुलट गया मामला”। और ड्राइवर को बस चलाने के लिये कहा।

सिपाही के अचानक नीचे धकेलने से मोहन एकदम से संभल नहीं पाया और जब तक वह संभलता बस आगे जा चुकी थी।

उसकी समझ में नहीं आया कि पहले वह अपने को कोसे कि उसने टिकट क्यों फाड़ दिया था या सिपाही और टिकट चैकर को गाली दे जिन्होने उसे फँसाकर लूट लिया था।

उसने गुस्से से जाती हुयी बस को देखा जिसके पीछे लिखी इबारत उसे चिढ़ा रही थी।

यो तो ऐसे ही चलेगी

…[राकेश]

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9 टिप्पणियाँ to “हॉफ टिकट”

  1. वर्णन जीवंत है। कहानी ने अंत तक उत्सुकता जगाये रखी।

  2. # यो तो ऐसे ही चलेगी #

    ये मजेदार है।

  3. बहुत खूब राकेश जी ,कितनी सरलता से आपने वो सारा ज़हर निचोड़ कर दिखा दिया जो हमारी नस नस में बस चका है …यो तो ऐसे ही चलेगी..इसके सिवा चारा ही नहीं दीखता .कोई अगर लुटे जाने की शिकायत करे कोई मरहम लेके आये तो लोग(बेईमान ) यहाँ सी.डी लिए तयार खड़े हैं.ये वो माहोल है जहां खुद मसीहा आये तो लुट जाए .शुक्रिया

  4. बधाई

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  5. रफत जी,
    धन्यवाद
    यही तो समस्या आ गयी है कि भ्रष्टाचार की अति हो गयी है और ईमानदारी विलुप्ता के कगार पर खड़ी है। थोड़ा समर्थन, सहयोग और स्वीकृति मिले ईमानदारी को तो यह अपनी सुगंधर बिखेरना शुरु करे फिर से।

  6. @Blogs In Media,

    आपके प्रयास के लिये साभार धन्यवाद!

  7. यो तो ऐसे ही चलेगी- बहुत सटीक…..

    बहुत सजीव…

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