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अप्रैल 21, 2011

ईमानदारी-भ्रष्टाचार के बीच झूलता मानस

रमेश ज़रूरी काम से गांव जाने के लिये सपत्नीक स्टेशन पहुँचा तो पाया कि पहले से ही मुसाफिरों की लंबी लाइन टिकट खिडकी पर लगी थी।

पत्नी बोली,” हे राम! टिकट कैसे मिलेगा, गाड़ी की रवानगी में बीस मिनट ही बचे हैं”।

रमेश मुस्करा कर बोला,” अभी मिलता है”।

और वह कुली के पास जा पंहुचा,” भाई! टिकट का इंतज़ाम हो जायगा क्या?”

“हाँ साब,  सौ रुपये अधिक लगेंगे”।

“कोई बात नहीं यार! तू टिकट तो दिला”।

यह बेईमानी की जीत थी!
….

पत्नी की बहुत मिन्नत के बाद रमेश सिनेमाघर गया था। टिकट खरीदारों की लंबी लाइन आगे सरक ही नहीं रही थी। बीच-बीच में एक दबंग टिकट खिडकी पर पहुँच कर इकट्ठे बहुत सारे टिकट लेता और वापिस भीड़ में टिकट ब्लैक करने आ जाता।

कतार तोड़ कर लोग स्वयं ही उसके साथ हो रहे थे।

रमेश सोच रहा था कैसे लोग हैं, जरा भी सब्र नहीं कर रहे। यूँ ही तो बेईमानी को बढ़ावा मिलाता है।
अचानक भडाक की आवाज़ के साथ टिकट खिडकी बंद हो गयी और दबंग की आवाज़ का सुर और भी तेज हो गया।

पत्नी बोली,” कुछ ही रुपये और लगेंगे, ले लो न टिकट”

कुछ तो टिकट नहीं मिलने की खीज थी और कुछ पत्नी द्वारा बेईमानी कराने की सलाह पर गुस्सा।

रमेश पत्नी का हाथ पकड कर घसीटता सा सिनेमाहॉल के बाहर निकल आया।

कारण कोई भी रहा हो पर यह ईमानदारी की तरफ उठा एक कदम था!

(रफत आलम)

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अप्रैल 21, 2011

भ्रष्टाचार का झगडा

विधायक की डिज़ायर से लेकर
मंत्री के आदेश तक
कोर्ट कचहरी में
तारीख लेने से
मुक़दमे का फैसला होने तक
डॉक्टर की फीस से लेकर
मरीज़ का ऑपरेशन होने तक
खुशी-खुशी चढ रहे हैं
हम सब बेईमानी की सीढ़ियां
हर कदम पर बाँटते हुए
रिश्वत की रेवड़ियाँ।

ये अघोषित सुविधाशुल्क
कामयाबी की छत तक पहुँचाने से पहले
फर्क मिटा चुका होता है
खरीदार और बिकवाल के बीच
यानी
घूस खिलाने वाला और घूसखोर
बराबर भागीदार है गुनाह के
हमाम में जब सभी नंगे हैं
फिर आखिर भ्रष्टाचार का झगडा क्या है?

(रफत आलम)

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