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अप्रैल 17, 2011

सच्ची इबादत

वो आँख ही क्या जिससे निगाह न हो
वो लब ही क्या जिससे आह न हो
वो दिल ही क्या जिससे चाह न हो
वो जिस्म ही क्या जिससे कराह न हो
वो आदमी ही क्या जिससे गुनाह न हो

मुटठी भर माटी की सजा अभी बाकी है!
…….

मस्जिदों में सर झुकाना ही इबादत नहीं है
मंदिरों में जाना ही इबादत नहीं है
जोड़ की दाढ़ियाँ बढ़ाना ही इबादत नहीं है
लंबी चोटियाँ लटकाना ही इबादत नहीं है
छाप-तिलक लगाना ही इबादत नहीं है

अपने भीतर की खोज सच्ची उपासना है शायद!

(रफत आलम)

अप्रैल 17, 2011

यक्ष प्रश्न

कहाँ से आया हूँ कहाँ जाऊँगा सवाल है

इस मुट्ठी भर माटी का राज़ समझ पाऊंगा सवाल है

ज़मीन को आसमान से मिलाऊँगा सवाल है

यहीं रहूँगा के नयी दुनिया बसाऊँगा सवाल है

क्या फिर कभी लौट के आऊँगा सवाल है

ये सवालात बन्दे सदा से लाजवाब हैं!

(रफत आलम)

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