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अप्रैल 12, 2011

लोकपाल समिति : सदस्यता लूट ले

भारत में चलती गाड़ी में चढ़ने की कोशिश करने वालों की संख्या बहुत अधिक है और नेतागण तो इस काम में बहुत आगे हैं। कुछ नेता लोकपाल मसले के बहाने अपनी छवि बनाने के लिये दैनिक स्तर पर तरह तरह की बयानबाजी कर रहे हैं और कुछ नेता इस पूरे मामले में पलीता लगाकर इसे उड़ाने की चेष्टा में हैं। इसे ध्वस्त करने की कोशिश करने वालों में सबसे बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो लोकपाल तैयार करने वाली समिति में शामिल लोगों पर एतराज करके अपनी अपनी पंसद के लोग वहाँ देखना चाहते हैं। बहाना वे कर रहे हैं कि महिला क्यों नहीं है, दलित क्यों नहीं है, पिछड़ा क्यों नहीं है, मुसलमान क्यों नहीं है, फलाना क्यों नहीं है ढ़िमाका क्यों नहीं है।

121  करोड़ लोगों की आबादी तले दबे भारत में भाँति-भाँति के लोग हैं और अगर किसी एक भी श्रेणी के लोगों की संख्या गिनी जाये तो वह भी करोड़ों में निकलेगी, मसलन गंजे लोग भी करोड़ों की संख्या में होंगे।

पूरे समाज का प्रतिनिधित्व यह समिति करे इसके लिये आवश्यक है कि समाज में वास कर रहे लोगों की हर श्रेणी से प्रतिनिधि इस बिल को बनाने वाली समिति के सदस्य होने चाहियें। तभी तो सामाजिक न्याय की कसौटी पर यह खरा उतरेगा। कुछ श्रेणियाँ नीचे सूचिबद्ध की गयी हैं।

लोकपाल बिल बनाने वाली समिति में निम्नांकित लोगों का होना बेहद जरुरी है।

  • एक काले बालों वाला, एक भूरे बालों वाला, और एक सफेद बालों वाला;
  • एक आधा गंजा और एक पूरा गंजा;
  • एक काली आँखों वाला, एक भूरी आँखों वाला, एक नीली आँखों वाला, एक कंजी आँखों वाला;
  • एक सिक्स पैक एब्स वाला, और एक तोंद वाला;
  • एक सबसे लम्बे कद का और एक सबसे छोटे कद का;
  • एक बिल्कुल स्वस्थ, और एक पूरी तरह से बीमार और रुग्ण शरीर वाला;
  • एक डी.लिट उपाधि वाला और एक बिल्कुल अनपढ़;
  • एक पूर्णतया शाकाहारी, एक पूर्णतया माँसाहारी;
  • एक दुनियाभर की सैर कर चुकने वाला और एक वह जो कभी अपने मोहल्ले से बाहर ही न गया हो;
  • एक हमेशा कपड़े पहनने वाला और एक हमेशा नग्न रहने वाला;
  • एक 32 दाँतो वाला और एक बिना दाँतो के पोपले मुँह वाला;
  • एक रोल्स रॉयस चलाने वाला और एक पैदल चलने वाला;
  • एक योग, व्यायाम करने वाला और एक सदा सोने वाला;
  • एक नाचने वाला और एक नाच न जाने आंगन टेढ़ा कहने वाला;
  • एक गा सकने वाला और एक गाने में गधे से मुकाबला करने वाला;
  • एक दिन में सोने वाला और एक रात में सोने वाला;
  • एक हिंसक और एक अहिंसक;
  • एक दो आँखों वाला, एक एक आँख वाला और एक न देख सकने वाला;
  • एक पूरा सुनने वाला और एक न सुन पाने वाला;
  • एक लगातार बोलने वाला और एक कभी भी बोल न सकने वाला;
  • एक दिन में तीन बार नहाने वाला और एक साल में एक बार नहाने वाला;
  • एक ब्रहमचारी और एक कामी;
  • एक ऐसा जो पत्नी के अलावा हरेक स्त्री में माँ-बहन देखे और एक ऐसा जिसे कम से कम एक बलात्कार का अनुभव हो;
  • एक साधु और एक हद दर्जे का अपराधी;
  • एक लगभग 5 साल का बच्चा और एक कम से कम 95 साल का वृद्ध;
  • एक सदैव प्रथम आने वाला और एक सदैव अनुत्तीर्ण होने वाला;
  • एक बला का शातिर, और एक निपट भोंदू…एकदम गोबरगणेश;
  • एक सवर्णों में सवर्ण, और एक दलितों में अति दलित;
  • एक अगड़ों में अगड़ा और एक पिछड़ों में पिछड़ा;
  • एक अतिआधुनिक, और एक पुरातनपंथी – एकदम पोंगापंथी;
  • एक खिलाड़ी और एक अनाड़ी;
  • एक खतरों का खिलाड़ी और एक चींटी तक से डर जाने वाला;
  • एक पुजारी और एक पूजा-प्रार्थना से घृणा करने वाला;
  • एक सन्यासी और एक संसारी;
  • एक आस्तिक और एक नास्तिक;
  • एक भ्रष्टाचारी और एक ईमानदार,
  • एक दानवीर और एक भिखारी;
  • एक महल में रहने वाला एक फुटपाथ पर बसर करने वाला;
  • एक वोट लेने वाला और एक वोट देने वाला;

आदि इत्यादी!

और बहुत सारी श्रेणियाँ छूट गयी हैं, पढ़ने वाले और इस मामले में रुचि रखने वाले लोग अपनी अपनी इच्छानुसार समाज के विभिन्न तबके के लोगों के प्रतिनिधि इस सूचि में जोड़ सकते हैं।

लोगों के बीमार शरीरों को ठीक करने वाली दवा को बनाने वाली शोधार्थियों की टीम से भारत के ये पंगेबाज महानुभाव यह नहीं कहते कि अपनी टीम में हर श्रेणी के लोग रखो क्योंकि वहाँ इनका बस नहीं चलता। करोड़ों तो ऐसे होंगे जो दवा का नाम भी ढ़ंग से उच्चारित नहीं कर सकते और वहाँ चूँकि शरीर के लाभ की बात है तो वहाँ इन्हे विशेषज्ञ चाहियें पर चूँकि यहाँ लोकपाल इनके हितों के खिलाफ है और चूँकि मामला मानसिक रुग्णता का है और मानसिक रुप से बीमार कभी भी ऐसा नहीं मानते कि वे बीमार हैं तो हरेक आदमी बढ़-चढ़ कर बोल रहा है।

जाति, सम्प्रदाय (रिलीजन), आर्थिक, क्षेत्र और भाषा के अंतर के मुद्दों को कुटिलता से उठाकर कुछ शातिर लोग लोकपाल बिल के मामले की हत्या करना चाहते हैं। इन शातिरों की राजनीति एक भ्रष्ट समाज में ही चल सकती है अतः वे घबराये हुये हैं कि अगर समाज ईमानदार बन गया तो उनकी दुकान बंद हो जायेगी इसलिये तरह तरह के मुखौटे ओढ़कर वे लोकपाल की भ्रूणहत्या करने आ गये हैं।

भारत को बचाना है तो ईमानदार, देशभक्त्तों को जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्रवाद, और भाषा के तुच्छ अंतरों को भूलकर अपनी एकता बनाये रखकर इन शातिरों को करारा जवाब देना पड़ेगा। अगर भारत के सर्वनाश से फर्क नहीं पड़ता तो बनाये रखो इसे भ्रष्ट, जातिवादी, और साम्प्रदायिक। वर्तमान के भारत के लोगों की आने वाली पीढ़ियाँ मानवता के निम्न बिंदू को छूकर नये कीर्तिमान स्थापित करेंगी।

अब यहाँ कालिदास बन सकने की प्रक्रिया और परंपरा मर चुकी है, बहुमत मूर्ख ही जन्मते हैं, मूर्ख ही जीते हैं और ऐसे ही धरा छोड़ जाते हैं।

मुस्कुराइये कि आप भारत में रहते हैं।

…[राकेश]

Pic: Courtesy – srknews.com

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अप्रैल 12, 2011

जय जवान

बर्फीले तूफान के कारण गाड़ी बहुत धीमे धीमे  चल पा रही थी। कप्तान साहब परेशान थे कि अगर समय रहते सुंरग तक न पहुँच पाये और किसी दुर्घटनावश सुरंग बंद हो गयी तो बहुत दिक्कत आ जायेगी। वे चालक से तेज चलाने के लिये कह भी नहीं पा रहे थे। इतने भारी हिमपात में वह गाड़ी चला पा रहा था यही बहुत बड़े साहस की और मूर्खता की बात थी। जब मैदानी बेस स्टेशन से चले थे तो हल्के हिमपात के ही आसार थे और उन्होने अनुमान लगाया था कि अगर हिमपात बढ़ा तो भी वे समय रहते सुरंग पार कर जायेंगे और उसके बाद तो धीरे धीरे भी गाड़ी चलायी तो भी अगले दिन तक कैम्प तक पहुँच ही जायेंगे। इसलिये वे सुबह छह बजे ही बेस स्टेशन से चल पड़े थे। पर दुर्भाग्य से रास्ते में ही हिमपात अनुमान से ज्यादा होने लगा और वे अपने अनुमानित समय से कुछ घंटे की देरी से सुरंग के पास पहुँचे। उनकी गाड़ी से पहले ही ट्रकों एवम अन्य वाहनों की कतारें सड़क पर खड़ी थीं। उनकी गाड़ी सुरंग से कम से कम १ किमी पहले ही रुक गयी। नीचे उतर कर पहले से खड़ी गाड़ियों से मालूम किया तो पता चला कि वहाँ लैंड-स्लाइडिंग होने से सुरंग का मुँह बंद हो गया है। बर्फबारी रुकने से पहले सुरंग की सफाई का काम शुरु नहीं हो सकता। इतनी भारी बर्फबारी में मशीने और मजदूर ही वहाँ तक नहीं आ सकते। बर्फबारी रुक भी जाये तो भी आड़े तिरछे खड़े वाहनों को हटाने में ही बहुत समय लग जाना है।
कप्तान साहब चिंतित हो गये। दुश्मन ने पर्वतों की चोटियों पर स्थित उनकी चौकियों पर चुपके से कब्जा कर लिया था। उनके लिये गाड़ी में रखी अत्यंत जरुरी सामग्री को अपने कैम्प तक ले जाना बहुत जरुरी था। चालक के अलावा उनके साथ सिक्योरिटी के लिये दो जवान और थे। उन्होने गाड़ी में मौजूद वायरलैस से बेस स्टेशन या कैम्प पर सम्पर्क साधने के लिये एक जवान से कहा परंतु सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाया। आतंकवादियों ने अलग दहशत फैला रखी थी राज्य में।

वे चिंतित होकर इधर उधर टहल रहे थे। कभी सुरंग की ओर जाते वाहनों के बीच स्थान खोजते हुये और कभी अपनी गाड़ी के पीछे की तरफ जाते। पीछे से उनके बाद भी कई वाहन आ गये थे।
समय बीत नहीं रहा था।

कुछ देर बाद उन्होने सेना की वर्दी पहने कुछ जवानों को कमर पर पिट्ठू बैग कसे हुये पास के ढ़लान से उतरते हुये देखा। उन्हे ऐसा लगा जैसे वे सुरंग के दूसरी ओर से आये हैं। वे लपक कर उनके उतरने की जगह के करीब पहुँचे। छह जवान सावधानी से ढ़लान से नीचे उतर रहे थे। जवान भी अपने सामने सेना के एक अधिकारी को खड़े देखकर कुछ चौकन्ने हो गये। उन्होने कप्तान साहब को सेल्यूट किया।

कप्तान साहब ने पूछा,” क्यों मेजर, क्या सुरंग के दूसरी तरफ से आ रहे हो आप लोग”।

जी साहब, उधर भी ऐसा ही हाल है। सुरंग बंद हो गयी है और वाहन अटके खड़े हैं। हम लोग तो कोई चारा न देखकर पैदल ही चढ़ाई करके आ रहे हैं। हमें लगा था कि इधर आ जायेंगे तो हो सकता है कि कोई वाहन वापिस जाने की तलाश में हो और हमें जगह मिल जाये

कहाँ जा रहे हो आप लोग?

साहब हम लोग तो छुट्टी पर घर जा रहे हैं। आप यहाँ कैसे अटक गये?

कप्तान साहब बातें करते करते उन्हे अपनी गाड़ी तक ले आये थे। कप्तान के साथ सेना के जवानों को देखकर उनकी गाड़ी में बैठे चालक और दोनों जवान भी गाड़ी से बाहर आ गये।

उन्होने जवानों से पीछे गाड़ी में बैठने को कहा। सब अंदर बैठ गये तो कप्तान साहब ने अपने साथ आये जवानों से थर्मसों में रखी चाय सबको देने के लिये कहा।

चाय पीकर सबके शरीर भी खुले और दिमाग में भी चुस्ती आयी।

कप्तान ने जवानों को बताया कि कैसे वे यहाँ अटक गये हैं और कैसे उनका कैम्प पर पहुँचना बहुत जरुरी है। उन्होने समस्या की गम्भीरता उन्हे बतायी।

जवानों ने कहा,” साहब सुरंग के दूसरी ओर तो सड़क का भी बहुत बुरा हाल है। बर्फ हटाये बिना वाहन चल भी नहीं सकते। अगर आप हमारी तरह चढ़ाई करके उधर पहुँच भी गये तो उधर कोई वाहन मिल भी सकता है परंतु इंतजार तो करना ही पड़ेगा जब तक कि रास्ता साफ न हो जाये”।

कप्तान साहब चिंतित स्वर में बोले,” अरे बहुत दिक्कत हो जायेगी अगर सामान न पहुँचा समय पर”।

थोड़ी देर गाड़ी में चुप्पी समायी रही। जवान एक दूसरे की ओर देख रहे थे। नये आये जवानों ने आँखों-आँखों में कुछ बातें कीं और उनमें से एक जवान ने कहा,” साहब एक काम हो सकता है। हममें से दो पिछले साल सर्दियों में भी ऐसे ही सुरंग के पास फँस गये थे। इतना खराब मौसम नहीं था पर सुरंग के दूसरी ओर वाहनों की दुर्घटना होने के कारण रास्ता बंद हो गया था और जाम लग गया था। बर्फ भी पड़ने लगी थी पर इतनी भारी बर्फबारी नहीं थी उस वक्त। हम आठ लोग थे और हम लोगों को ड्यूटी ज्वाइन करनी थी। हम लोगों ने पैदल ही रास्ता पार किया था। सुरंग से करीब दस किमी चलना पड़ेगा पर आगे शायद मौसम ठीक हो और वाहन मँगवाया जा सके”।

कप्तान साहब की आँखों में चमक तो आयी पर उन्होने सीमायें भी जता दीं,” हम तो केवल तीन लोग हैं, चालक को तो यहीं गाड़ी के साथ रहना होगा, सामान हमारे पास बहुत है, बिना सामान के जाने का कोई मतलब नहीं और उसे छोड़ा भी नहीं जा सकता, बल्कि यहाँ गाड़ी के साथ भी एक और जवान चाहिये”।

कप्तान साहब कुछ कहना चाहते थे पर हिचकिचाहट के मारे कह नहीं पाये और गाड़ी से बाहर धुआँधार गिरती बर्फ को देखने लगे।

जवान कप्तान साहब की परेशानी समझ गये। सैनिकों के दिमाग और ह्रदय एक ही तरीके से काम करते हैं। उन्होने फिर से आपस में इशारों में बात की। आशायें, लाचारियाँ और फर्ज आपस में गुत्थमगुत्था हुये पर जो निकल कर आया उसने कप्तान साहब को चौंका दिया।

एक जवान ने कहा,” साहब, हम लोग आपके साथ चलते हैं। अपने अपने पिट्ठुओं में सामान भर लेंगे”।

“पर आप लोग छुट्टी पर जा रहे हैं। कितने समय बाद जा रहे होंगे। घर-परिवार के लोगों से मिलने की उत्सुकता होगी”।

“साहब आप इस बात की चिंता न करें। फर्ज छोड़कर तो भागेंगे नहीं। पीठ दिखाकर चले गये तो कैसी छुट्टियाँ? घरवालों के साथ रहते हुये भी कैसे कटेंगी वे”।

कप्तान साहब के पूरे चेहरे और आँखों में गर्व दमकने लगा। गर्वीले और जोशीले स्वर में उन्होने कहा,” शाबास मेजर! आप जैसे जाबांजों पर सेना और पूरा देश फख्र करता है”।


जवानों ने साहसी स्वर में कहा,” साहब चूँकि गाड़ी यहीं रहेगी आप चालक से इतना इंतजाम करने के लिये कह दीजिये कि हमारे घरों पर सूचना दे दे कि शायद आने में देरी हो जाये और एक दो दिन में हम सम्पर्क कर लेंगे।”

कप्तान साहब ने कहा,” उसकी आप लोग चिंता न करें। मैं कोशिश करुँगा कि आपके अधिकारी आपकी छुट्टियाँ रीशेडयूल कर दें। चालक के पास वायरलैस है वह बेस स्टेशन पर सम्पर्क साधने की कोशिश करता रहेगा और आप अपने डिटेल्स उसे देंदें वह सब सम्भाल लेगा”।

उन्होने झट से योजना बना दी। उन्होने कहा चूँकि हमारे पास केवल दो हथियारबंद जवान हैं सो दोनों हमारे साथ चलेंगे। गाड़ी के साथ चालक और आप में से कोई एक रुक जाओ।

जवानों ने झटपट अपने अपने पिट्ठुओं को खाली करके उनमें कप्तान साहब की दी हुयी सामग्री भर ली।

थोड़ी देर बाद ही बर्फीले तूफान को मात देते हुये अपने फर्ज़ को अंजाम देने के लिये भारतीय सेना के आठ जांबाज सैनिक अपने अपने कंधों पर भारी पिट्ठुओं को लादे चढ़ाई चढ़ते जा रहे थे।

…[राकेश]

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