गम भी न आये रास तो क्या करुँ

देर तक करता रहा था मंजिल की बात
हमराही जो अचानक रास्ते में ठहर गया
सफर की थकन अक्सर मुझसे पूछती है
साथी जो तेरे साथ था बता किधर गया
………

वो कसमें थीं  के वादे किसे याद हैं
भटक जाता है यूंही ध्यान का क्या
आपकी दुनियादारी से शिकायत नहीं
कह गयी होगी कुछ ज़बान का क्या
………

अब रुलाता नहीं अहसास क्या करूँ
तबियत भी नहीं उदास क्या करूँ
कई दिनों से दिल पर बोझ ही नहीं
गम भी नहीं आया रास क्या करूँ
………

चमन में यूं ही फूल खिल रहे है और खिलते रहेंगे
सूखे हुए दरख्त मगर बहार का इन्तज़ार नहीं करते
फिर रहे हैं महफिलों में उजड़ी हुई मुस्कान के साथ
अहले दिल कभी अपने गम का इज़हार नहीं करते

(रफत आलम)

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2 टिप्पणियाँ to “गम भी न आये रास तो क्या करुँ”

  1. [देर तक करता रहा था मंजिल की बात …हमराही जो अचानक रास्ते में ठहर गया…सफर की थकन अक्सर मुझसे पूछती है…साथी जो तेरे साथ था बता किधर गया|
    अहले दिल कभी अपने गम का इज़हार नहीं करते]
    शानदार काव्याभिव्यक्ति रफत जी

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