वक्त की धुंध

महफिलों के चिराग कभी हम भी थे
खुशबुओं के बाग़ कभी हम भी थे
वक्त की बात राह की धूल भी नहीं
मंजिलों के सुराग कभी हम भी थे

चिराग थे महफ़िलें थीं दोस्त हज़ार थे
खवाब थे बेखुदी थी जाम थे खुमार थे
अपने ही घर में अजनबी हैं हम के जो
कभी शहर में रौनक के अलमबरदार थे

(अलमबरदार=ध्वज वाहक)

सूरज साथ चला करता था अपने साथ
चाँद लिपट के नींद लेता था अपने साथ
अब अँधेरे भी हमसे बच कर चलते हैं
कभी उजाला ही उजाला था अपने साथ

वक्त की धुंध में खो गयी सब पहचानें
तस्वीरों की कैद में कुछ यादें मौन हैं
मुखौटों का सफर खत्म को है शायद
हमें भी पता नहीं अब के हम कौन हैं

(रफत आलम)

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3 टिप्पणियाँ to “वक्त की धुंध”

  1. धुंध में रहने की आदतें

    उजालों और बि‍जलि‍यों को

    बुरा कहती हैं

    और मैं सोचता हूं

    कि‍ अब तो इनसे
    नि‍कलना ही होगा

  2. अपने को पा लेने के करीब की अनुभूति.

  3. बहुत बढ़िया रफत जी।
    अंततः तो जीवन में अकेलेपन को साक्षी भाव से देखकर, उससे बिना जूझे, उसे समझ कर, चलते जाने से ही अर्थ भरता है।

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