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अप्रैल 9, 2011

वक्त की धुंध

महफिलों के चिराग कभी हम भी थे
खुशबुओं के बाग़ कभी हम भी थे
वक्त की बात राह की धूल भी नहीं
मंजिलों के सुराग कभी हम भी थे

चिराग थे महफ़िलें थीं दोस्त हज़ार थे
खवाब थे बेखुदी थी जाम थे खुमार थे
अपने ही घर में अजनबी हैं हम के जो
कभी शहर में रौनक के अलमबरदार थे

(अलमबरदार=ध्वज वाहक)

सूरज साथ चला करता था अपने साथ
चाँद लिपट के नींद लेता था अपने साथ
अब अँधेरे भी हमसे बच कर चलते हैं
कभी उजाला ही उजाला था अपने साथ

वक्त की धुंध में खो गयी सब पहचानें
तस्वीरों की कैद में कुछ यादें मौन हैं
मुखौटों का सफर खत्म को है शायद
हमें भी पता नहीं अब के हम कौन हैं

(रफत आलम)

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