Archive for अप्रैल 8th, 2011

अप्रैल 8, 2011

इस बार जंग ये जीत ली जाये

भ्रष्टाचार की फैक्टरी में
लोकहितकारी योजनाओं का लहू
निचोड़ा जाकर
सोने में बदला जा रहा है

अनगिनत बैंक लोकरों संग्रणग्रहों में
दफन हो चुके हैं सपने जो
विकास की हकीकत बनने थे
प्रजातंत्र के चारों स्तंभ
चोर उच्चके लफंगों के कब्जे में हैं
विवेक दुबका पडा है
बोले तो जान की खैर नहीं

तुमने देखा नहीं क्या
सच के उपासकों का अंजाम
कल ही एक जिंदा जलाया गया है
बाकी की तलाश में हैं गोलियाँ
आज के सफ़ेदपोश आतकंकारी
करोड़ों उम्मीदों के ये कातिल
बदतर हैं विदेशी दुश्मनों से
जिनके बम सौ पचास जानें लेते हैं

जो भी इन्ही की गफलत से
फौजी ताबूत और गोलीरोधी जाकेट तक
निगल खाए बेईमानों ने
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
बेलगाम हैं ऊँगलीमालों के काले घोड़े

अब तथागत कहाँ?
कौन गाँधी?
फिर भी अचीर इस अंधकार में
रौशनी की दीर्घ किरण
अन्ना हजारे
बुझने से पहले
सुनहरा सूरज तुम्हे सौंपने को है आतुर

ए! छले गए, लूटे गए, बहलाए गए
शोषितो-शापितो-मुफलिसो
खास तौर से नौजवानो
बहुत कर चुके हो आत्महत्याये
अब वक्त शहादत का आया है
सच का कफ़न बाँध कर चल पडो
अन्ना हजारे के साथ
क्या पता
बेईमानों के विरुद्ध जंग
इस बार हम जीत ही जाएँ?

(रफत आलम)

Pic. courtesy : Hindustantimes

अप्रैल 8, 2011

रागिनी अपने और देश के सम्मान के लिये कुछ भी करेगी

“तुम पक्के देशद्रोही बन चुके हो सुदीप”, आवेश से तमतमाती हुयी रागिनी ने कहा।

“हराम… तू बहुत गाँधी की चमची बन रही है”। गुस्से में थूक उगलते सुदीप ने हाथ घुमाकर रागिनी को थप्पड़ मारना चाहा।

रागिनी पीछे हट गयी और फुफकारते हुये बोली,” दोबारा हाथ उठाने की गलती मत कर बैठना सुदीप बहुत पछताओगे, सालों जेल में सड़ोगे और अगर बच गये तो तुम्हारे जैसे नीच आदमी को तो…”। रागिनी बात पूरी करते करते रुक गयी।

सुदीप आग्नेय नेत्रों से रागिनी को घूरता रहा पर रागिनी के हौसले और रुप को देखकर उसकी हिम्मत नहीं हुयी कि वह उस पर फिर से हाथ उठा पाता।

बात आज उस समय शुरु हुयी जब सुदीप रात को घर आया। वह बाहर से पीकर आया था। बीती रात भी उसकी और रागिनी की तू तू मैं मैं हो गयी थी। सुबह घर से जाते हुये उसकी और रागिनी की कोई बात नहीं हुयी थी। आज वह यह सोचकर घर आया था कि रागिनी को मजा चखा देगा उसके सामने ज़बान खोलने के लिये। आज रात वापस घर आने के बाद सुदीप गुस्से से पागल हो गया यह जानकर कि शाम को ही रागिनी उनके बेटे, सौरभ, को अपने भाई के घर छोड़ आयी थी।

उसने गुस्से से लालपीले होकर पूछा कि रागिनी की हिम्मत कैसे हुयी ऐसा करने की?

उसके गुस्से की परवाह न करते हुये रागिनी ने शांत भाव से उसे जवाब दिया कि वह नहीं चाहती थी कि सौरभ के सामने उन दोनों के मध्य झगड़ा हो और आज उसे सुदीप से बात करनी ही करनी थी।

उनमें तकरार बढ़ती रही।

सुदीप रागिनी को गालियाँ देता रहा और वह उसे आइना दिखाती रही, उसकी गलतियों, कमजोरियों एवम उसके छल-कपट को उजागर करके।

मीडियाकर्मी सुदीप को बिल्कुल भी आदत नहीं थी कि कोई उसकी बात को काटे या उसकी बात को नज़रअंदाज़ करे। उसकी इच्छा तो हो रही थी कि वह रागिनी को पटक पटक कर पीटे पर रागिनी के रुप को देखकर उसकी हिम्मत हुयी नहीं और वह मौखिक रुप से उसे गालियाँ बक कर ही अपने गुस्से को उस पर उड़ेलता रहा।

वैसे तो शादी के बाद से ही सुदीप की आदतों के कारण रागिनी उसके साथ बहुत सहज नहीं हो पायी और उनके बीच अक्सर तनाव घर कर लेता था। पिछले कई महीनों से तो दोनों के बीच लगातार तनाव चल रहा था। उनके बीच का तनाव क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान और बढ़ गया।

सुदीप को आदत थी हर बात में निगेटिव पहलू देखने की। वह सारे समय ही चिढ़ा हुआ रहता था। अपनी कही बात के अलावा उसे किसी और की कही बात कभी नहीं सुहाती थी। अपनी बात तो उसे परम सत्य लगती और दूसरों की हर बात में उसे साजिश दिखायी देती।

तंग रागिनी ने उसे यह सब कहा भी कि वह पूर्णतया निगेटिव विचारधारा का आदमी होता जा रहा है। वह लोकतांत्रिक तो बिल्कुल भी नहीं था। क्रिकेट के विश्वकप के दौरान तो उसने हद ही कर दी। भारत-पाक मैच के प्रसारण के दौरान जब वह घर आया तो पाकिस्तान के बल्लेबाज खेल रहे थे और सुदीप यह देखकर चिड़ गया कि रागिनी और सौरभ खुश हो होकर मैच देख रहे थे। जैसे ही पाकिस्तान का विकेट गिरता वे हल्ला मचा मचाकर खुश होते। सुदीप ने सौरभ के चाँटा मार दिया और टीवी बंद करके उसे पढ़ने बैठने के लिये कहा।

विश्वकप शुरु होने से पहले से ही अपनी आदत के मुताबिक सुदीप विश्वकप की मुखालिफत में लगा हुआ था। मीडिया खरीद लिया गया है…सब कुछ फिक्स है…यह सब इलीट वर्ग की अय्याशी है आदि इत्यादि वचन उसके दिमाग से सारे समय झरते रहते।

जागते रहने के दौरान ज्यादातर समय वह फेसबुक और टविटर पर संदेश लिखता रहता और अपनी सनक इधर उधर फैलाता रहता। अपने जैसे ही लोग वहाँ मिल जाने के कारण उसे ऐसा लगता कि वह बहुत बड़ी क्रांति का जनक बन गया है।

रागिनी ने यह सब कुछ उसके सामने उजागर किया।

उसने कहा,” सुदीप तुम घोर जातिवादी आदमी बन गये हो और क्या पता तुम पहले से ही ऐसे हो और पहले इस बात को छिपा कर रखते रहे हो। अब तो तुम्हारी हर बात से जातिवाद की झलक मिलती है। तुम्हे खुद ही नहीं पता कि तुम निगेटिविटी के रास्ते पर कितना आगे जा चुके हो। तुम्हारे अनुसार जो भी विचार तुम्हारे अंदर नहीं पनपा है वह गलत है। तुम्हे कुछ भी कहीं भी अच्छा होता हुआ दिखायी नहीं देता। तुम्हे देश की हर बात गलत लगती है। कमी तुम्हारे अपने अंदर है पर तुम सारा समय उसे दूसरों पर थोपने में लगे रहते हो। मैंने भी तुम्हारी ही जाति में जन्म लिया है, कुछ सालों से इसे ओबीसी में मान लिया गया है, मैंने तो कभी बचपन से जाति के नाम पर किसी तरह के शोषण का सामना नहीं किया, मेरी मित्रता तो स्कूल कॉलेज में हर जाति के साथियों से रही। और जहाँ तक मेरी जानकारी है तुम्हे भी ऐसा कुछ कभी सहन करना नहीं पड़ा फिर तुम्हारे अंदर जातिवाद का इतना जहर कहाँ से भर गया? तुम जो चारों तरफ जातिवाद के नाम पर जहर फैलाते रहते हो तुम्हारी अंतर्रात्मा तुम्हे कचोटती नहीं? तुम अपने आप तो दलितों और अपने से ज्यादा पिछड़ी जाति वाले लोगों से इतना भेद करते हो फिर तुम कैसे यह सब नाटक कर लेते हो जैसे तुम्ही एक अकेले मसीहा हो इस देश में सामाजिक न्याय के?

उस दिन तो एक दूसरे को कोसकर दोनों सो गये पर जब अन्ना हज़ारे दिल्ली आकर आमरण अनशन पर बैठ गये तो सुदीप और रागिनी में फिर से तकरार बढ़ गयी। अनशन की पहली रात सुदीप जब घर लौटा तो रागिनी अपनी सहेली से फोन पर अन्ना हज़ारे के अनशन के बारे में ही बातें कर रही थी। सुदीप उसके उत्साह से और ज्यादा चिढ़ गया, उससे सहन नहीं हो रहा था कि रागिनी फोन पर इस तरह से खुश हो होकर इन बातों को करे। वह तो दिन भर फेसबुक और टविटर पर अन्ना हज़ारे के आंदोलन को बोगस करार देता रहा था और लोगों को बताता रहा था कि कैसे यह इलीट वर्ग के दिमाग की खुजली से ज्यादा कुछ भी नहीं है। जंतर मंतर पर जुटी भीड़ को उसने सिरफिरों की भीड़ बताया था जिन्हे और कोई काम नहीं है।

जैसे ही रागिनी ने फोन बंद किया सुदीप ने जहरीले लहज़े में उससे कहा,” झाँसी की रानी बनने का काम खत्म हो गया हो खाना परोसो”।

रागिनी आहत तो हो गयी पर वह शांत रही। खाना खाने के बाद सोने से पहले सुदीप ने रागिनी को धमकाते हुये कहा कि वह इस तरह की फिजूल बातों से पल्ला झाड़ ले और कैसे यह बातें उसके अपने आदर्श के खिलाफ हैं और लोग क्या कहेंगे जब उन्हे पता चलेगा कि उसकी अपनी पत्नी ही उसके विचारों से सहमति नहीं रखती।

बात बढ़ गयी और वह गाली गलौच पर उतर आया और रागिनी के माता-पिता को भी गरियाने लगा तो रागिनी ने भी मोर्चा खोल दिया और उसकी कलई खोलने लगी।

क्रोध में पागल सुदीप ने पास रखा पानी का जग रागिनी को फेंक कर मारा था जो सौभाग्य से उसे न लग कर दीवार पर लगकर चूर हो गया।

गुस्से से रागिनी तुरंत कमरे से बाहर निकल गयी थी और सौरभ के कमरे में जाकर अंदर से कमरा बंद कर लिया था।

सुबह रागिनी ने सौरभ को स्कूल भेजा तो सुदीप सो रहा था और बाद में दोनों में कोई बात नहीं हुयी।

अब दोनों आमने-सामने खड़े थे और रागिनी कह रही थी।

“तुम्हारे इतने घटिया व्यवहार के बावजूद मैं आज शाम सौरभ को भैया के यहाँ छोड़कर वापस आते समय यह सोच कर आयी थी कि तुम्हे एक मौका और दिया जाये और मैं खुले दिमाग से आयी थी पर तुम इस लायक हो नहीं कि तुम्हारे साथ किसी किस्म की कोई रियायत बरती जाये। तुम्हे पता है सुदीप तुम हद दर्जे के काइयाँ इंसान हो। शायद तुम्हारी रीढ़ की हड्डी है ही नहीं। तुम्हारे सारे काम इस आशा से होते हैं कि राजनीतिक दल तुम्हे पिछड़ों का खैरख्वाह मान लें और कोई पोस्ट दे दें। सारा दिन तुम इस कोशिश में रहते हो कि किसी तरह पिछड़े और दलित वर्ग से आने वाले नेता ही तुम्हारी विचारधारा से प्रभावित होकर तुम्हे बुला लें और कोई पद दे दें। तुम्हारी लालची नज़र हरेक विचारधारा के दल की तरफ लगी रहती है कि कोई तो तुम्हे राजनीतिक सहारा दे दे। और तो और जिन राष्ट्रीय दलों को तुम पानी पी-पी कर कोसते हो और उन्हे सवर्णों के दल बताते हो उन दलों की तरफ देख कर भी तुम्हारी लार टपकती रहती है कि वही तुम्हे अपने पिछ्ड़ा एवम अन्य पिछड़ा वर्ग का नेता और विचारक मान कर जगह दे दे। जिन नेताओं से तुम्हे आशा है कि किसी दिन वे तुम्हारी ओर हडडी का टुकड़ा फेंकेगे उनमें तुम्हे रत्ती भर भी बुराई नज़र नहीं आती पर बाकी सब नेता तुम्हारे हिसाब से तुम्हारी तथाकथित सामाजिक न्याय की थ्योरी के दुश्मन हैं। तुम्हारे अंदर किसी दलित या पिछड़े के लिये कोई संवेदना नहीं है, इन शब्दों का मुखौटा तुमने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिये चढ़ा रखा है। हर वर्ग, हर जाति में अच्छे और बुरे लोग हैं पर तुम तो देश में जहर फैला रहे हो। अपनी घटिया थ्योरी के लिये तुम देश बेचने से भी बाज नहीं आओगे। रात दिन तुम मीडिया को कोसते रहते हो और नौकरी भी वहीं करते हो। तुम्हे खुद नहीं पता होगा कि तुम्हारी असलियत क्या है “।

“सुदीप तुम एक कुंठित जीव हो। तुम्हे इंसान कहना इंसान की तौहीन करना है। तुमने अपने अंदर इतना तेजाब इकट्ठा कर लिया है कि तुम्हारे पास और तुम्हारे साथ रहने वाले लोग उसमें जलने लगे हैं और एक दिन तुम खुद इसमें गल जाओगे। मैं और मेरा बेटा, हम दोनों ही तुम्हारे साथ नहीं रहेंगे। मुझे तुम्हारी जरुरत है नहीं और अपने बेटे को तुम्हारी जरुरत मैं महसूस होने नहीं दूँगी। हम दोनों के जीवनयापन के लिये मैं समर्थ हूँ और न भी होती तो भी तुम्हारे जैसे जहरीले आदमी की छाया से अपने बेटे को बचाना मुझे इंसानियत का पहला कर्त्तव्य जान पड़ता है। तुम्हारी तो छाया पड़ने से भी आदमी निगेटिव हो जाये। इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ तुम जैसे द्रोही न केवल जन्म लेते हैं बल्कि उन्हे और उनकी हरकतों को सहन भी किया जाता है। सुधार अपने घर से और अपने अंदर से शुरु होता है और मुझे खुशी है कि आज मैं तुम्हारे जैसे वैचारिक रुप से अति-भ्रष्ट और कर्म से अति-निम्न कोटि के आदमी को अपने जीवन से दूर कर रही हूँ।  बिल्कुल साफ शब्दों में तुम्हे कह रही हूँ कभी मेरे और मेरे बेटे के रास्ते में आने की चेष्टा भी मत करना वरना तुम्हारे लिये अच्छा नहीं होगा। हमारे लिये तुम्हारा अस्तित्व समाप्त होता है।”

सुदीप को गुस्से में बिलबिलाता छोड़कर रागिनी घर से बाहर चली गयी जीवन की नयी शुरुआत करने।

….[राकेश]

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