Archive for अप्रैल 7th, 2011

अप्रैल 7, 2011

नया गाँधी और भूरे अंग्रेज

जो बेचते  थे मुल्क कभी वो विदेशी थे
तुमने यारो जयचंद को भी मात किया
गरीब के फंड में जब डाका डलना था
नेता ने सबसे आगे अपना हाथ किया
……..
बूढ़ा साधु बेईमानों को सबक सिखाने निकला है
नौजवान बच्चो तुम्हारे ज़मीर का इम्तेहान होना है

लाखों बंद लाकरों में देश काला धन अटा पड़ा है
चाबियाँ जाच एजेंसी का प्रमुख खुद छुपा लेता है

पगार तेरी चालीस हज़ार बच्चा विदेश में पढता  है
बता तो सही अफसर ये ऊँचा महल केसे बना है

माना के भ्रष्टाचार का विष रग रग में उतर गया है
ईमानदारी की दवा से रोग का उपचार हो सकता है

टूटती  साँसें पहले भी कह कर गुज़र गयी है राम
इन्कलाब उठाने फिर एक मसीहा उठ खड़ा हुआ है

मुट्ठियाँ तानो छले हुए लोगो न्याय की राह चुन लो
चलो के भ्रष्टाचार का विष वृक्ष जड़ से मिटाना है

वो भूखा बैठा है और राजा दावतें उड़ाते फिर रहे हैं
चले आओ शोषितों अपनी भूख का बदला लेना है

किसी भी तरह से जुडो यारो सच के साथ आ जुडो
गाँधी का इन्कलाब उठाने अन्ना खम ठोके खड़ा है

(रफत आलम)

अप्रैल 7, 2011

अन्ना आये हैं दिया जलाने

ईमानदारी दर-ब-दर है इस दौर में
ईमानदारी मौत की डगर है इस दौर में
ईमानदारी फाकों का सफर है इस दौर में
ईमानदारी काँटों का बिस्तर है इस दौर में
ईमानदारी नाकारा हुनर है इस दौर में
ईमानदारी मुश्किल से मुशकिलतर है इस दौर में
ईमानदारी है तो किधर है इस दौर में?

अन्ना बाबा तुम्हारी कोशिशों को सलाम !

भ्रष्टाचार देश का आचार-व्यवहार बन गया है
भ्रष्टाचार चाल-चलन और चरित्र का यार बन गया है
भ्रष्टाचार कामयाबी का औजार बन गया है
भ्रष्टाचार ताकत का इश्तेहार बन गया है
भ्रष्टाचार राजशाही का प्रचार बन गया है
भ्रष्टाचार फायदे का व्यापार बन गया है
भ्रष्टाचार कमजोर का जिंदा मज़ार बन गया है

अन्ना बाबा तुम्हारी कोशिशों को सलाम !

(रफत आलम)

अप्रैल 7, 2011

प्राण जाये मगर अब तो लड़ जायेंगे

ऊबी आँखों में टूटी हुयी नींद है
रंग अलग सा अलग सी है जीवन की लय
बेहिची, बेदिली, बेकली औसतन
सड़ते गलते हुये सूखे बदन
हँस लिये रो लिये
पी लिये लड़ लिये
ज़िंदा रहना था
करके रहे सौ जतन।

साँस लेना था खूँ को पसीना किया
हाथ शर हो गये, पाँव घिसते रहे
रोशनी के लिये, ज़िंदगी के लिये
रात दिन एक चक्की में पिसते रहे।

आग उगलती हुयी जलती बंजर जमीं
जनम से अब तक जल रहे हैं शरीर
नर्क क्या है कहाँ है कौन जाने है ये
नर्क जैसी जगह पर पल रहे हैं शरीर।

जीने मरने के चक्कर का अंजाम क्या
ये समय क्या, सवेरा क्या शाम क्या
रीत कैसी है ये, क्या तमाशा है ये
कैसा सिद्धांत, कैसा ये इंसाफ है
कितने दिल हैं कि जिनमें है चिंगारियाँ
देखने को सभी कुछ बहुत शांत है।

सिर छुपाने को छाया नहीं न सही
बस ही जायेगी बस्ती कोई फिर नयी
अपने हाथों में चक्की है बाकी अभी
ज़ुल्म के काले डेरे उखड़ जायेंगे
सह चुके हम बहुत अब न सह पायेंगे
न सह पायेंगे
प्राण जाये मगर अब तो लड़ जायेंगे।

काली रातों के पीछे सवेरा भी है
कोई सुंदर भविष्य तेरा मेरा भी है

(मदहोश बिलग्रामी)

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