Archive for अप्रैल 6th, 2011

अप्रैल 6, 2011

इस मुल्क में हमारी हुकुमत नहीं रही (दुष्यंत कुमार)


ये कैसा भारत बना लिया है हमने कि देश के स्वास्थ्य को कोढ़ की तरह खाकर मृत्यु शैय्या पर ले जाने वाले भ्रष्टाचार का जड़ से समूल विनाश करने के लिये ईमानदार भारतीय चाहते हैं कि कदम उठाये जायें और लोकतंत्र (जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन) के नाम पर राजसुख भोगने वाले नेतागण और अधिकारीगण तरह तरह की चालाकियाँ दिखा रहे हैं जिससे कि जनहित वाला लोकपाल विधेयक विधिवत रुप से कार्यकारी न हो जाये। ऐसा हो गया तो उनके विशाल उदरों में काले धन की पूर्ति कैसे होगी? जनता चाहती है कि लोकपाल विधेयक अपने संशोधित रुप में जारी हो और नेता और अधिकारी इस जिम्मेदारी से मुँह चुरा रहे हैं।
किसी सभ्य लोकतांत्रिक देश में ऐसा नहीं हुआ होगा जैसा भारत में हो रहा है। लोकतंत्र में जनता जो लोकहित में चाहती है वैसा करना सरकारों का कर्त्तव्य होता है।
आज भारत उस मोड़ पर आकर खड़ा है जब अगर अभी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता सामुहिक रुप से न उठी तो फितर यह इस देश से कभी भी रुखसती न पा पायेगा और ऐसे ही दैनिक जीवन का अपरिहार्य अंग बने रह कर इस पावन देश का नाश कर देगा।
कोई आश्चर्य नहीं कि अगर भविष्य में कोई सच्चा मनुष्य दुखी होकर चित्कार कर बैठे

दुनिया में अगर कहीं नर्क है
तो बस यहीं (भारत) है यहीं है!

क्रिकेट जैसे व्यवसायिक खेल के प्रति गजब की एकजुटता दिखाने वाले भारतीय, और खासकर इसकी युवा पीढ़ी, जिसमें करोड़ों युवा आते हैं, अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसी ही एकजुटता दिखा दें तो भारत के धनी से धनी, शक्तिशाली से शक्तिशाली, बड़े से बड़े लोग सात दिनों के अंदर घुटनों के बल बैठे मिलेंगे।

युवा पीढ़ी का सुंदर भविष्य निर्भर करता है इस बात पर कि उनका देश कितना ईमानदार है क्योंकि ईमानदार माहौल में ही वे अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं। भ्रष्टाचार मुक्त माहौल में वे अपने नये से नये विचारों को फलीभूत होते देखने का प्रयास कर सकते हैं। भ्रष्टाचार लील लेता है युवा पीढ़ी के अरमानों को।

भ्रष्टाचार से लड़ना आज के भारतीय युवा की सबसे बड़ी जरुरत है।

अगर आज नहीं लड़े तो फिर उन्हे एक भ्रष्ट देश के निकृष्टतम माहौल में ही बूढ़े होकर मर जाना होगा। और अगर आज भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त्त कर दिया गया तो इसकी उड़ान को दुनिया में कोई नहीं रोक सकता।

आज के आंदोलित माहौल में सबसे ज्यादा याद आते हैं तेजस्वी कवि स्व. दुष्यंत कुमार।

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

………………………………………………

आज सड़कों पर
……………………………………

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख
पर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख

एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह
यह हक़ीक़त देख लेकिन खौफ़ के मारे न देख

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख

ये धुंधलका है नज़र का तू महज़ मायूस है
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख

राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई
राख में चिनगारियां ही देख अंगारे न देख

स्व. दुष्यंत कुमार की आग्नेय कविताओं का पाठ

P.S. : Pic. Courtesy The Hindu

अप्रैल 6, 2011

सुकून-ए-दिल…

सीना तो है दिल कहाँ है
कोई बताये कातिल कहाँ है

एक गुमनाम सा सफर ये
जिंदगी की मंजिल कहाँ है

कैसे जिए ये और है बात
जिए जाना मुश्किल कहाँ है

सुना है बहुत उदास है वो
मेरे गम में शामिल कहाँ है

खो गया कहीं आंसुओं में
गोरे गाल का तिल कहाँ है

बेवजह हंगामों से कोई पूछे
ताड़ हुए भाई तिल कहाँ है

मैंने खुद को किया है हलाक
कोई दूसरा कातिल कहाँ है

बेशऊर भीड़ का है तमाशा
जनाब ये महफ़िल कहाँ है

सुकून-ए-दिल चाहिए मगर
आलम सुकून-ए-दिल कहाँ है

(रफत आलम)

%d bloggers like this: