Archive for अप्रैल 3rd, 2011

अप्रैल 3, 2011

हर पग पे लुटेरे बैठे हैं

चोर के घर मोर साहूकार के फाका है
अँधेरी है ये नगरी और चौपट राजा है

सब सफ़ेद यहाँ जो भी काला धंधा है
आ जा हाथ धोले पगले बहती गंगा है

बाढ़ जो खाए वही बागबान सयाना है
चोर चोर सब भाई कौन यहाँ मौसेरा है

लोकशाही नाम को अवाम की सत्ता है
कुर्सी का खेल बन्दर बाँट से चलता है

मलाई पर हक साहब के दलाल का है
फाइलों के तले दबा ईमानदार गधा है

ऐशगाहों की सैर कर सुबह घर लौटा है
रईसों का हर लाडला शाम का भूला है

बन्दर की बाँट से नेताओं ने सीखा है
पांच साल तू लूट आगे हिस्सा मेरा है

पसीना तो बेरोजगार भटकता फिरता है
सुगंधों का झोंका सब मौके ले उड़ता है

सब रहनुमा सियार हैं शेर की खाल में
कोई खाई है आलम तो कोई कुआँ है

(रफत आलम)

 

%d bloggers like this: