ज़िंदगी का सफर

ढ़ल चली शाम लोग तो अपने घर जायेंगे
हम चौराहे से उठ कर जाने किधर जायेंगे

कैंचियों की बंदिश में हैं आजकल परवाज़ें
हौसले बचा भी लिए तो परिंदों पर जायेंगे

तालाब गन्दा मगरमच्छों ने किया है मगर
इलज़ाम हर हाल मछलियों के सर जायेंगे

लम्हे फूलों की सेज पर भी कहाँ ठहरे यार
लम्हे काँटों के बिस्तर पे भी गुज़र जायेंगे

उगते तारे देख जी खुश हो रहा था बहुत
क्या पता था आँसू पलकों में उतर जायेंगे

फूल नहीं हैं जो मुस्करा उठेंगे फिर कल
हम बिखरे तो सदा के लिए बिखर जायेंगे

ऐसे भी बदनसीब हैं जो जिंदा ही मर गए
वक्त आने पर तो माना सभी मर जायेंगे

मौत के बाद भी निजात जाने हो के नहीं
इस कश्मकशे जिंदगी से तो गुज़र जायेंगे

सदियों का सवाल आज भी वही है सवाल
कहाँ से आये हैं हम आखिर किधर जायेंगे

कसक मिटे न मिटे ये और बात है आलम
वक्त के साथ माना ज़ख्म तो भर जायेंगे

(रफत आलम)

Advertisements

One Comment to “ज़िंदगी का सफर”

  1. दिल को छू गयी ! मर्मस्पर्शी !

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: