भगत सिंह का खून (कृष्ण बिहारी)

सारे दिन उदास रहने के बाद
शाम भी अगर उदासी में गुजर जाये
और हर पल
अपनी खामोशी में
ठहर जाये
तो लगता है कि
ज़िंदगी का सबसे संवेदनशील हिस्सा
बगैर छटपटाए मर गया है
या फिर
ज़िंदगी की नस-नस में
तेज ज़हर भर गया है।

मैं नहीं जानता मेरे दोस्त!
मुझे बताओ
कि ऐसा क्यों होता है
तमाम हलचलों के बाद भी
आदमी एक खालीपन
क्यों ढ़ोता है
या
चीख-पुकारों
शोर-शराबों के बावजूद
आदमी के ईर्द-गिर्द
बर्फ की तरह जमा हुआ
सन्नाटा क्यों होता है?

तुम कुछ भी कह सकते हो
दर्शन और तर्क में बह सकते हो
मगर
दर्शन और तर्क
मेरी समस्या का
समाधान नहीं है।

मेरे दोस्त!
मेरा सवाल
इतना आसान नहीं है
आओ मेरे साथ
तुम्हे वे चित्र दिखाऊं
ऐसा कुछ बताऊं
जिसे दिखाने और बताने में
एक पूरी व्यवस्था डरती है
और बड़ी निर्ममता से
सेंसर करती है।

ज्यादा दिन नहीं हुये
उसके बेटे को गोली लगी थी
और उसका बेटा
पूरे देश का बेटा हो गया था
क्योंकि
उसने प्रशासन के खिलाफ
आंदोलन किया था।

कितना अच्छा लगता है
दूर से सुनना
देश के किसी बेटे के बारे में
खासतौर पर तब
जब
वह अपने घर में पैदा न हुआ हो
अच्छा लगता है
भगत सिंह के खून से
मातृभूमि की मांग में
सिंदूर बोना
मगर किन्ही आँखों का
जीवन भर रोना
न दिखायी पड़ता है
न सुनाई पड़ता है
आखिर,
यह कैसी जड़ता है!

और,
उस दिन
जब अंधेरा घिरने से पहले ही
कुछ लुटेरे
उसके घर में
जबरन घुस आये थे
तब उसके नेत्र
प्रशासन की नहीं
मात्र अपनी असमर्थता पर
छलछलाये थे।

खेती क्या रखवालों से बचती है!

तब उसकी आँख
न रो रही थी
न गा रही थी
हाँ,
उसकी जवान बेटी
उसे समझा रही थी
कि
कुछ भी तो नहीं हुआ
सिवाय इसके कि
उसकी दोनों जाँघों के बीच
हेलीपैड समझकर
हेलीकॉप्टर उतर गये।

पशु और मशीन में
जो थोड़ा- सा सूक्ष्म अंतर है
वह बुद्धि के प्रयोग का है
और
बुद्धि दोनों के पास नहीं है।
फर्क बस इतना है कि
आदमी का पशु होना खतरनाक है
और,
यह घटना
एक आज़ाद मुल्क के
फिर से गुलाम होने की
शुरुआत है।

और,
वह रात
जिसमें एक खास बात
अपने आप हो गयी थी
जिसके फलस्वरुप
अनेक तकदीरें हमेशा के लिये
असमय सो गयीं थीं
चाहे वह अलीगढ़ हो
या फिर जमशेदपुर
या लखनऊ हो
या फिर
कानपुर
मैं नहीं समझता कि
इन जगहों के लोगों के बीच
कोई फर्क आ गया था
हाँ,
अगर आप मानें
तो मैं कहूँ कि –
एक सफेदपोश बड़ी चालाकी से
फिरकापरस्ती बो गया था।
फिर जो कुछ हुआ
उसे न व्यवस्था बता पाई
और न आप जान पाये।

….. ये तो सिर्फ घटनायें हैं
जो चंद सिरफिरे करते हैं।
ऐसा सफेदपोश कहते हैं।
और –
आप और हम
ज़िंदगी के मरे हुये हिस्से का
अनचाहा बोझ सहते हैं।

आदमी मर गया है!

{कृष्ण बिहारी}

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One Comment to “भगत सिंह का खून (कृष्ण बिहारी)”

  1. aapki kavita padhi. …hatprabh huun… barbarata aur pashuta ke khilaaf jo samvedanaa hai.. kaash vah beej bankar .. akshar akshar men padatii aur … .. aisee hii kavitaayen prashaasan ..ke kaanon par ranbheriyan bajaatin to .jaag uthataa soya hua . anchaaha .mara hua zindakii ka bojh … kaash yah hota..

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