फागुन में बहारें होली की

गंगा-जमनी संस्कृति कभी जनमानस में कविता, दर्शन और गायकी द्वारा रंग, उमंग और उलासमयी जीवन भरा करती थी। अनेकता में एकता की यह पारद बूँद बंटवारे की राजनीति के चलते बिखरती–बिखरती समाप्त सी होकर अब काव्यगोष्ठियों और समिनारों में सिमट गयी है। गुज़रे गए सुनहरे वक्त के आकाश पर सूफियत और प्रेम के जगमग सितारों में से एक हज़रत नजीर अकबराबादी १८वी सदी में पुरनूर थे। उनकी रचनायें उस धवल दौर का सच्चा प्रतिबिम्ब हैं जिसमें ईद के उल्लास साथ होली भी रंगीनियाँ भी बराबर की भागीदार हैं।

होली के रसमय और रंगमय दिन के लिए उनकी होली सम्बंधित रचनाओं में से एक मस्त नज़्म प्रस्तुत है।

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़ूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।

हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे
कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की

गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।

और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के,
हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के,
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के,
कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के,
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।

ये धूम मची हो होली की, ऐश मज़े का झक्कड़ हो
उस खींचा खींची घसीटी पर, भड़वे खन्दी का फक़्कड़ हो
माजून, रबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुलफा कक्कड़ हो
लड़भिड़ के ‘नज़ीर’ भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश महकते हों, तब देख बहारें होली की।

[ ख़ूम शीश-ए-जाम – मदिरानशापात्र ,   गुलरू – पुष्प सामान यहाँ सुन्दरी,   अहंग – शोले-जोश ]

प्रस्तुती – रफत आलम

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4 Responses to “फागुन में बहारें होली की”

  1. ”तब देख बहारें होली की”, संभवतः और भी लंबी रचना है. वैसे यहां जितनी है, बहुत दिन बाद पढ़ने को मिली, धन्‍यवाद.

  2. राहुल सिंह साहिब सही फरमाया है आपने . सरलता को ध्यान में रखते हुए नज़्म के क्लिष्ट बंद नहीं दिया है .

  3. Nazir Akbarabadi kee yah rachna bahut hi khubsurat hai.

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