अंतिम नहीं यह हादसा

मेरे साथ
यह हादसा पहली बार हुआ हो
ऐसी बात नहीं है।

हाँ, पहली बार जब किसी ने
नींबू की तरह निचोड़कर
आम की तरह चूस कर
पूरी ताकत से दूर फेंक कर
मेरी तरह से दृष्टि मोड़ ली थी
तब मैंने केवल यह सोचा था कि
क्या ऐसा भी होता है?
और अब सोच रहा हूँ कि
हमेशा ऐसी ही तो होता है।

तब और अब के हादसों में
कोई खास फर्क नहीं है
सिवाय इसके कि
अनुभूति की सांद्रता बढ़ गयी है,
मैं यह भी नहीं कह सकता कि
यह हादसा अंतिम होगा।

पहली बार लहूलुहान हो गया था
खून छलक आया था
जिस्म के हर हिस्से से
सच पूछो तो शमशान हो गया था
ऊब गया था
अपने ही हर किस्से से।

एक लम्बा वक्त्त लगा
घावों को भरने में
जीवन को
संयमित करने में
लेकिन फिर अचानक
हवा का कोई एक झोंका
खुशबू लिये
नथूनों  में भर गया
जब तक मैं संभलूँ
तब तक वह अपना काम कर गया।

कितना वक्त्त लगता है ज़हर को
जिस्म में फैलने में
या खुशबू को
साँस में उतरने में
मुझे लगा कि जिस्म को इस बार
कोई पथराये चाकू से रेत गया है
मेरे वजूद को मेरी ही ताकत से
कसकर उमेठ गया है।

तिलमिलाहट ने मुस्कुराकर
मुझसे बार-बार मजाक किया
और फिर पूछा –
मेरे पास फिर आओगे?
मैंने पूरी आँखों से उसे देखा
धीरे- से जवाब दिया
मैं डरा नहीं हूँ
अभी मरा नहीं हूँ
तुम सुरक्षा कवच पहने हो
तुम्हारा खेल जारी है
तुम्हारे हाथों में खंजर
और मेरे पास
निहत्थे होने की लाचारी है।

और यदि निहत्था न भी होता
तो क्या
तुम पर वार करता?
इतना कमजोर नहीं हूँ मैं कि
डर से तुम्हारा यानि कि
हादसों का साथ छोड़ दूँ
तुम भले ही छोड़ जाओ
आदत तुम्हारी है।

{कृष्ण बिहारी}

4 टिप्पणियाँ to “अंतिम नहीं यह हादसा”

  1. निभाना और निभाते रहना भी एक आदत ही है.

  2. हादसे को लेकर बेहतरीन रचना

  3. स्वभाव से इतर जाना मुश्किल होता है।

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