इंकलाब और पुरातन गुलाम मानस

दूर से देख रहे हो तुम!

पेटों पर रखे हुए पत्थर आखिर
उछाल खाकर
महलों के शीशों से टकरा गये हैं
काट ली गयी ज़बानों ने
कारागृह की जंजीरों से वाणी पा ली है
सोच लिया है मजबूरी ने
भूखे मरने से कही बेहतर है
गोलियों की ज़द में सर उठाये जान देना
दबी कुचली इंसानियत की
रोटियों का सपना आँखों में लिए
शहादत कब बेकार जाती है?
ज़ुल्म का तख़्त पलटना तय है!

दूर से देख रहे हो तुम !

तुम्हारे मुकद्दर में कहाँ है सर उठा के जीना
ऐ! जाति-धर्म–उंच–नीच की बेड़ियों में जकड़े
रूढ़ियों के सनातन गुलामों
तुम्हें कसम है!
अपनी भूख– प्यास– गरीबी– नादानी की
अपने दूध को तरसते बच्चों की
दवा के आभाव में लहू थूकती पत्नियों की
झुग्गियों के बाहर पड़े बूढ़े-भूखे माँ-बापों की
एक बोतल शराब या सौ के नोट के बदले
यूंही बिकते रहना हर पांचवे साल
अपना वोट
मुल्क के उन्ही रहनुमाओं को दे आना
जो सफेदपोश हैं बड़े
पर आज भी दिल से वही गली के गुंडे हैं
विकास की सोच क्या करेंगे
लूटखोरी जिनकी फितरत है
घोटाले यूँ ही तो नहीं हो रहे
बेईमान! देश की आबरू नीलाम कर
स्विस बैंकों का पेट भर रहे हैं
तुम्हें रोटी भी मयस्सर नहीं तो क्या
इनके कुत्ते विदेशी केक खाते हैं

दूर से देख रहे हो तुम!

सर पे कफ़न बाँधे उजाले की तलाश में
अँधकार से दो हाथ करते लाखों दीवाने
रक्ताभ है उनका सूरज अभी
क्या ताज्जुब कल उजली धूप मिल ही जाये
तुम्हे मगर यूँ ही दूर से रौशनी के मंज़र देखने हैं
ऐ! अंधेर नगरी के चौपट बाशिंदों
खुली आँखों पर पर्दा रखे चलने वालो
तुम्हे इंकलाब की मंजिल नहीं मिलने वाली
इस सूरते हाल में तो नहीं।

कभी नहीं!

(रफत आलम)

One Comment to “इंकलाब और पुरातन गुलाम मानस”

  1. बहुत हार्ड हिटिंग कविता है रफत जी

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