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फ़रवरी 26, 2011

जीवन दबे पाँव आता है

इन्साफ तेरा सदा सच्चा मगर बंदानवाज़
आदमी के होंटों पर रोती हुई फ़रियाद है
हर किये गए गुनाह की सजा मुझे मिले
गुनाह सिखाने वाला शैतान तो आज़ाद है
…….

अनगिनत चले गए बेशुमार आते हैं
एक उठ जा रहा है तो हज़ार आते हैं
यह दुनिया का बाज़ार भी है अजीब
यहाँ बिकने के लिए खरीदार आते हैं
…….

सुबहदम फूल जब खिलखिलाता है
ओस के कतरे उससे कुछ कहते हैं
जीवन संगीत बजता है बांसुरी में
छेद हैं बहुत फिर भी सुर बहते हैं
………

हर आदमी की जुदा है तकदीर
कोई सुखी तो कोई दुखी क्यों है
उस निगाह में जब सब बराबर
फिर भी दुनिया दो-रंगी क्यों है
………..

कुछ पाने की इच्छा में दरअसल
सब कुछ खोने का पता लिखा है
मिल जाए तो माटी है सोना भी
न मिले तो भी सब माटी होना है
……….

धडकन की सदा सुनकर मन ने सोचा
किसकी आहट है जाने कौन आता है
सांस की आँख ने पहचान कर कहा
पगले! दबे पाँव ये तो जीवन जाता है

(रफत आलम)

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