उपलब्धि का अहंकार…(संत सिद्धार्थ)

मित्रों!

उपलब्धियाँ अक्सर एकांगी होती है और इनसे प्राप्त अहंकार जीवन को एकरंगी बना देता है। जीवन तो भिन्न- भिन्न अनुभव लेने से समृद्ध होता है।

एक क्षेत्र में उपलब्धि हासिल करके चादर तान के सो गये और मन में सोच लिया कि संसार फतेह कर लिया तो बहुत बड़ी भूल-भूलैया में फँस गये।

दौलत तुमने बहुत कमा ली या माता-पिता से मिल गयी और इसी कारण फूले-फूले रहने लगे तो तब तो तुम बहुत बड़े गरीब रह गये जीवन में। धन की अधिकता में तुमसे जीवन भर यह अहसास तो अनछुआ ही रह जायेगा कि अभाव क्या है?

बहुत बड़े पद पर पहुँच गये हो तो इस बात का अहंकार मत करना कि बस अब सारा जीवन तुम्हारी मुट्ठी में आ गया है, तुम अपने विभाग के सबसे छोटे पद पर काम करने वाले कर्मचारी के जीवन से एकदम अपरिचित हो। वह क्या सोचता है? उसकी क्या सीमायें हैं?

पाने का ही नाम जीवन नहीं है बल्कि अभाव भी एक जीवंत अनुभव है।

तुम बहुत बड़े कवि बन गये हो, पर जरा सोचो तो कि कितने अच्छे अच्छे गद्य लेखक दुनिया में तुम्हारे साथ ही विचरण कर रहे हैं और तुमने अभी तक श्रेष्ठ किस्म का गद्य रचने का आनंद नहीं लिया।

तुम तो सिर्फ अपने जैसा जीवन जानते हो। दिन के बहुत सारे घंटे व्यवसाय में ऊँचाई पाकर किसी बड़े पद पर आसीन होने की मह्त्वाकांक्षा का पीछा करने में खर्च हो जाते हैं तो ऐसी जीवनशैली से उत्पन्न व्यस्तता और अहंकार से तुम बहुत सारे अन्य तरह के भावों से अनभिज्ञ ही रह जाओगे।

अपने से अलग लोगों को, भले ही वे तुम्हारे सामने आर्थिक रुप से गरीब हों, उपलब्धियों में कमतर लगते हों, निम्न भाव से न देखना, किसी न किसी मामले में वे तुमसे ज्यादा उपलब्धि रखते होंगे।

केवल सफलतायें तुम्हे बहुत गहरे नहीं ले जा सकतीं। तुम्हे इसे भी जानना है कि असल में असफलता क्या है?

जब तक एक ही भाव के दोनों पूरक हिस्सों को नहीं जान लोगे तब तक दोनों ही से परे होने का अहसास नहीं जान पाओगे।

न पाने में अटकना है और न ही अभाव में। किसी भी एक भाव में अटक गये तो जीवन बेकार ही जाने के पूरे पूरे आसार बन जाते हैं। जीवन तो इन सब भावों से परे जाने के लिये है और इसके लिये एक भाव के दोनों परस्पर विपरित रुपों को जानना, पहचानना और जीना आवश्यक है।

किसी भी क्षेत्र में उपलब्धि पाना बहुत बड़ी योग्यता है और इसके लिये जीतोड़ प्रयास करो पर उपलब्धियों का अहंकार भूल कर भी न करो।

वास्तव में उपलब्धि जनित अहंकार का अकेला तत्व ही मनुष्य के जीवन को गरीब बना कर छोड़ देता है। इस अहंकार की उपस्थिति में आध्यात्मिक विकास असंभव है।

ये सब साधारण उपलब्धियाँ, जो तुम्हे बहुत बड़ी लगती हैं, और ये सारे अभाव जो तुम्हे बहुत बड़े लगते हैं, ये सारी बातें माध्यम हैं तुम्हे एक बड़े लक्ष्य की यात्रा से दूर रखने के। इन्ही सब बातों में अटक गये तो इन्ही के होकर रह गये।

जब जीवन में साधारण उपलब्धियों और अभावों से गुजर जाओगे तब तुम्हे आभास होगा उस अभाव का जिसे भरने के लिये की गयी यात्रा ही मनुष्य जीवन में सार्थकता ला पाती है।

बस साक्षी बने रहो, एक दिन वह प्यास जगेगी जरुर, एक दिन तुम उस परम यात्रा पर निकलोगे जरुर।

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5 Responses to “उपलब्धि का अहंकार…(संत सिद्धार्थ)”

  1. जिन्‍हें आमतौर पर उपलब्धि माना जाता है, अध्‍यात्‍म की दृष्टि से उनका कोई मूल्‍य नहीं होता.

  2. सार्थक जीवन दर्शन। धन्यवाद।

  3. सार्थक पोस्ट. बधाई!

  4. Uplabdhi ka garb hamen apne aap me chota bana deta hai yadi uplabdhi ka shreya us vyakti ko samarpit karen jisne hamen k

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