ठूंठ…

तुम किसी मोड़ पर तो मिलोगे
क्या कहोगे?
कुछ कह भी सकोगे?
भाषा विचारों को अभिव्यक्त्त न कर पाये तो भी
विचार नहीं मरते
भाव नहीं गलते।

पर, दिक्कत वहाँ जरुर होती है
जहाँ विचार साथ छोड़ गये हों
वहाँ अगर शब्द मिल भी गये तो क्या
व्यक्त्त भी हुये तो क्या?
जिस्म और रुह
का ठूंठ होना
इसी को कहते हैं
हरियाली में सूख गये
पेड़ की मानिंद।

{कृष्ण बिहारी}

6 टिप्पणियाँ to “ठूंठ…”

  1. दृष्‍टा और दृष्टि के बिना निरर्थक दृश्‍य.

  2. बहुत ही बढ़िया . अच्छा लगा

  3. जहाँ विचार साथ छोड़ गये हों…

    ठूंठ होना
    इसी को कहते हैं…

    बेहतर….

  4. विचारों में भाव बिना शब्द हैं बेअर्थ
    फिर प्रभाव की आशा करनी है व्यर्थ

  5. jahan shabd nahin , bhaaw nahin , arth nahin ,, vahaan sab thooth hi to bachata hai .. kavi ke man men iss baat kii peeda hai ..

  6. vichar kabhi nahin marte .. aur jab vichar mar jaayein toh jeewan ka bageecha sookh jata hai .. well said

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