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फ़रवरी 24, 2011

पत्थरों की बस्ती…

शिकवे दुनिया भर के थे लबों पर आया कभी नाम क्या
इससे बढ़ कर करते हम तेरी जफ़ाओ का एहतराम क्या

गीला तकिया गवाह है किस हालत में गुजरी रात मेरी
तन्हा बिस्तर ये बता काफी नहीं अश्कों का इनाम क्या

हम आवारा लोग ठहरे भटकते रहना हमारी किस्मत है
ए मंजिलों के सौदाई बता तुझको मिल गया मुकाम क्या

काँटों की नोक पर बैठे फूलों से अक्सर पूछा है हमने
मुस्कराते फिरने से ज़ख्म को मिलता है आराम क्या

जिस्म की आग ने मुझको गन्दी नालियों में जा डुबोया
एक भले आदमी को देख हवस से मिला है इनाम क्या

पल दो पल को आँखे बोल लेती थी क्यों पर्दा कर भागे
तुम दूर खिडकी की ओट में बैठे भी हुए बदनाम क्या

जान की खैर मनाओ यहाँ से चल निकलो आलम साब
पत्थरों की इस बस्ती में तुमसे शीशाबदनों का काम क्या

(रफत आलम)

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