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फ़रवरी 22, 2011

नहीं रहा…

एक ज़ख्म हरा था नहीं रहा
दर्द खुद मसीहा था नहीं रहा

दिल का रिश्ता था नहीं रहा
वह दोस्त मेरा था नहीं रहा

जम गया दर्द सूनी आंखों में
पानी का झरना था नहीं रहा

कोई भी अब याद नहीं आता
मुझे अपना पता था नहीं रहा

अपनों का सलूक क्या कहिये
ज़माने से गिला था नहीं रहा

अमीर खुद है वक्त का खुदा
गरीब का खुदा था नहीं रहा

लोग आज कुरान बेच खाते हैं
ईमान कभी जिंदा था नहीं रहा

काला धंधा काली हकीकत है
रोज़गार सपना था नहीं रहा

डूबती कश्ती में ठहरता कौन
नाखुदा से गिला था नहीं रहा

गम की लौ में जलबुझा दिल
मोम का टुकड़ा था नहीं रहा

रोती होंगी सन्नाटों भरी राहें
आलम आवारा था नहीं रहा

(रफत आलम)

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