अपना जूता अपने सर

कुछ साल पहले ही देश में युवाओं को अट्ठारह साल की उम्र में वोट देने का अधिकार दे दिया गया था। केबल टी.वी ने भी देश में धूम मचा दी थी।

चारों लड़के- अ, ब, स, और द, वोट देने का अधिकार पा गये थे। टी.वी, सिनेमा, किताबें और अखबार आदि में परोसी जाने वाली सामग्री उनके अंदर बन रहे हार्मोन्स  की गतिविधियों को और ज्यादा उछाल दे रही थी।  उनकी शारीरिक और मानसिक इच्छाओं ने ऐसा गठबंधन कर लिया था कि सारे समय वे इन्ही सब बातों में खोये रहते थे।

केवल लड़को को शिक्षा देने वाले कॉलेज में कक्षा में बैठें हो या घर पर, राह पर चल रहे हों या बिस्तर पर लेटकर सोने की तैयारी कर रहे हों, उनके दिलोदिमाग पर स्त्रीजाति ही छायी रहती। उनकी बातें भी घूमफिर कर स्त्री-पुरुष के मध्य होने वाले शारीरिक सम्बंधों पर पहुँच जाती।

उनकी अतृप्त इच्छायें उन्हे ऐसी सामग्री भी पढ़वाने और दिखवाने लगीं जिन्हे समाज में छिपाकर इस्तेमाल किया जाता है और कानून पकड़ ले तो पुलिस वाले घूसखोर हुये तो ठीक मामला कुछ या बहुत कुछ देकर रफादफा किया जा सकता था पर अगर पुलिस वाले को ईमानदारी के कीड़े ने काटा हुआ हो तो मामला काफी जिल्लत भरी स्थितियाँ सामने ला सकता था।

एक जैसी सोच वाले और एक जैसे मर्ज वाले लोग बड़ी जल्दी मिल जाते हैं और कॉलेज में भी इन लड़कों को उकसाने वाले ऐसे साथी मिल जाते जो उनकी इच्छाओं को कुछ झूठी और कुछ सच्ची कहानियाँ मिर्च मसाला सुनाकर और भड़का रहे थे। किसी के पास होली के अवसर की कहानियाँ थीं। कोई ऐसा भाग्यवान था जहाँ किसी स्त्री ने उसे डाक्टरेट तक की शिक्षा ही दे दी थी।

इन किस्सों को सुनकर इन लड़कों को लगता कि एक वे ही संसार में भाग्यहीन हैं जिन्हे अपनी इच्छायें पूरी करने का मौका नहीं मिलता वरना दुनिया तो ऐश में जी रही है।

एक शाम ट्यूशन पढ़कर लौटने के बाद अपनी किस्मत को कोसते हुये चारों लड़के नदी किनारे लगी बेंच पर बैठे हुये अपने पसंदीदा विषय पर चर्चा कर रहे थे। पास ही उनकी साइकिलें खड़ी थीं। कॉलेज से छुट्टी होने के बाद वे वहीं बाजार में कुछ खाकर ट्यूशन के लिये चले जाया करते थे। ट्यूशन से लौटते तो इधर उधर घूमकर शाम को अंधेरा होने के बाद ही घर लौटा करते थे।

सड़क के एक ओर नदी और दूसरी ओर पत्थर की बाड़ सड़क के साथ साथ लगी हुयी थी। बाड़ करीब बीस फुट ऊँची होगी और नदी किनारे वाली इस सड़क के साथ-साथ ही ऊपर भी एक सड़क थी। ऊपर की सड़क से नीचे आने के लिये जगह- जगह सीढ़ियाँ भी थीं और थोड़ा आगे जाकर दोनों सड़कें एक मोड़ पर मिल भी जाती भी थीं और वहाँ से ऊँची सड़क पर वाहन चला कर भी जाया जा सकता था।

सूरज छिप चुका था।

लड़के साइकिलें चलाते हुये सड़क के रास्ते ऊपर पहुँच गये।

वहाँ वे अपनी अपनी साइकिल पर बैठे बैठे जमीन पर पैर टिकाकर बातें करने लगे।

बातें करते करते एक लड़के की निगाह नीचे वाली सड़क पर गयी और उसने बाकी साथियों को इशारा किया।

अंधेरा छाने लगा था पर इक्का दुक्का स्ट्रीट लाइट्स जल चुकी थीं और उस रोशनी में उन्हे दिखायी दिया कि दूर से एक स्त्री और पुरुष उसी तरफ चलते हुये आ रहे थे जहाँ वे पहले खड़े थे।

दमित इच्छाओं ने लड़कों के सोचने समझने की शक्त्ति को पहले ही अपनी गिरफ्त में ले रखा था। उनके दिमाग में शैतानी से बड़ी खुरापात सर उठाने लगी।

उन्होने योजना बना ली कि आज वे भी नारी शरीर का ऊपरी तौर पर थोड़ा बहुत अनुभव ले सकते हैं।

‘अ’ ने कहा,” मैं और ‘ब’ इधर से साइकिल से आगे जाते हैं और कुछ देर बाद हम दोनों साइकिल ऊपर ही खड़ी करके जोड़े के पीछे पहुँचकर सीढ़ियों से नीचे उतर जायेंगे और तुम दोनों अभी नीचे जाओ और नदी किनारे खड़े रहकर उनका इंतजार करो। ऐसी जगह खड़े रहना जहाँ रोशनी न हो और जब वे पास आ जायें तो तुम दोनों एकदम से आदमी को पकड़ लेना और उसकी आँखों पर रुमाल आदि बाँध देना और हम दोनों महिला को पकड़ लेंगे। अंधेरा होगा वे दोनों कुछ देख नहीं पायेंगे। अपन लोग कुछ मस्ती करके ऊपर भाग लेंगे।”

योजना के मुताबिक अ और ब साइकिल से ऊपरी सड़क पर ही उस दिशा में चल दिये जिधर से जोड़ा आ रहा था और स और द वहीं से सीढ़ियों से नीचे उतर गये और बिजली के खम्बे से कुछ दूर अंधेरे में नदी की ओर मुँह करके खड़े हो गये।

उनकी सांसें तेज चल रही थी और धड़कनें तो दौड़ लगा रही थीं। योजना बनाना और बात है और उस पर अमल करना एकदम अलग बात है।

जोड़ा पास आता जा रहा था| ‘स’ और ‘द’ की घुकधुकी बँधी हुयी थी। स्त्री अपने साथी से कुछ बोल रही थी। लड़कों को लगा कि जोड़ा उनसे दस हाथ की दूरी पर ही होगा, वे मुँह घुमा कर जोड़े की तरफ देखने लगे।

जोड़ों के पीछे ऊपर से पत्थरों की बाड़ के बीच बनी सीढ़ियों से उतरते दो साये भी उन्हे दिखायी दिये।

‘स’ और ‘द’ भ्रमित थे कि क्या करें। ‘द’ ने ‘स’ को कोहनी मारी, तैयार रहने के लिये।

जोड़ा पास आ चुका था। अभी भी स्त्री ही बोल रही थी।

‘स’ और ‘द’ हिले ही थे कि उनकी हलचल से चौंककर जोड़े ने उनकी ओर देखा।

पुरुष के हाथ की टॉर्च चमक उठी और लड़कों के चेहरों पर पड़ी।

अरे तुम दोनों, यहाँ क्या कर रहे हो? घर नहीं गये अभी तक।

आवाज सुनकर ‘स’ और द’ अवाक रह गये। जोड़ा उनके एकदम पास खड़ा था।

भैया आप… भा…भी जी … क…ब आये आ…प… लोग?

‘स’ ने हकला कर कहा।

पीछे सीढ़ियों से उतरते साये जहाँ थे वहीं चिपक कर रह गये।

आज दोपहर बाद। ‘अ’ कहाँ है? अभी तक घर नहीं पहुँचा, तुम्हारे साथ भी दिखायी नहीं दे रहा।

भैय्य्य्य्या वो …वो … यहीं था अभी चला गया है ऊपर वाली रोड से गया है।

जोड़े के पुरुष और महिला ‘अ’ के बड़े भाई और भाभी थे!

उनकी शादी के वक्त्त ही ’अ’ के दोस्तों ने उसकी भाभी को देखा था और अब शादी के लगभग साल भर बाद वे लोग वहाँ आये थे।

…[राकेश]

चित्र : साभार – life.com

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3 टिप्पणियाँ to “अपना जूता अपने सर”

  1. वर्तमान युवा मन की मानसिकता की परते खोलती प्रेरक कथा और क्लाइमेक्स तो क्या कहने .भटकन ही भटकन है जवानी रास्तों में /रहनुमा आज काले लिबास में मिलते हैं .

  2. हिन्दी लघुकथा के लिए कृपया देखें और जुड़ें https://www.facebook.com/LaghukathaSahitya

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