मुझे आदमी मिला नहीं

आज अरसे बाद
पूछा है तुमने
कैसा हूँ मैं?

आखिर क्या हुआ है जो
देखता भी नहीं अब
मैं तुम्हारी ओर।

क्या करोगे जानकर
मेरी बात मानकर
कि आदमी होकर आदमी के भीतर मुझे
आदमी मिला नहीं।

आज भी जारी है
मेरी तलाश…
मगर तुममें नहीं
भावनाविहीन निर्विकार
चेहरे को देख
क्या पा सकूँगा मैं?
क्या दे सकोगे तुम?

{कृष्ण बिहारी}

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2 टिप्पणियाँ to “मुझे आदमी मिला नहीं”

  1. samvedanaaon ka aisa akaal hai .. ki aadamii ke bheetar bhi aadmi nahin milata hai…kavi ke paas sookshm samvedanaon ko bhi mahsoosane ki chaahat hai ..

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