जानी दुश्मन भी बने हैं माँ के जने

तम में उजाले की दुआ करते हैं यारो
बुझे दीपकों के भी कुछ सपने हैं यारो

दीखत में लिबास बहुत उजले हैं यारो
बदन कोयले की दलाली करते हैं यारो

दिन ने ज़रूर कहीं आग पिलाई होगी
शोले रात भर आँखों से बरसे हैं यारो

यकीन और भरम में फर्क थोडा सा है
वो मेरे कब हुए जो मेरे अपने हैं यारो

संबंधों में गिरावट की अति तो देखो
जानी दुश्मन बने माँ के जने हैं यारो

बर्तनो की खनक से घर कहाँ उजड़ता
भाई तो रसोइयां भी तोड़ चले हैं यारो

दिन वो भी थे जो खुशबू जो जैसे उड़ गये
दिन ये भी हैं के पहाड लगते हैं यारो

सोचो तो प्यास में भी तृप्ति है वरना
मयकदे पीकर भी लोग तरसते हैं यारो

बहुत आसान हो गया है उसको भुलाना
हम अपने आपको ही भूल गये हैं यारो

जितने ज़र्फदार थे कब के सब मर गए
बचे हैं आलम साब बहुत नकटे हैं यारो

(रफत आलम)

2 टिप्पणियाँ to “जानी दुश्मन भी बने हैं माँ के जने”

  1. बुझे दीपकों के सपने की बात करने की अदा अच्छी है.

  2. [सोचो तो प्यास में भी तृप्ति है वरना …. मयकदे पीकर भी लोग तरसते हैं यारो]

    रफत जी,
    कही है अच्छी गज़ल

    धन्यवाद

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